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Rigveda / 10 / 86 / 20

धन्व॑ च॒ यत्कृ॒न्तत्रं॑ च॒ कति॑ स्वि॒त्ता वि योज॑ना । नेदी॑यसो वृषाक॒पेऽस्त॒मेहि॑ गृ॒हाँ उप॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 86 | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : वृषाकपिरैन्द्र इन्द्राणीन्द्रश्च | देवता : वरुणः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : धन्व॑ । च॒ । यत् । कृ॒न्तत्र॑म् । च॒ । कति॑ । स्वि॒त् । ता । वि । योज॑ना । नेदी॑यसः । वृ॒षा॒क॒पे॒ । अस्त॑म् । आ । इ॒हि॒ । गृ॒हान् । उप॑ । विश्व॑स्मात् । इन्द्रः॑ । उत्ऽत॑रः ॥ १०.८६.२०

पदार्थ : (वृषाकपे) हे सूर्य ! (धन्व च यत् कृन्तत्रं च) चाप-कमान और जो छेदनसाधन शर-बाण (कति स्वित्-ता योजना) किन्हीं योजन-योक्तव्य स्थान हैं (अस्तं वि-आ-इहि) अपने वसन्तसम्पात घर को छोड़ (नेदीयसः-गृहान्-उप०) अत्यन्त निकट के घरों को प्राप्त कर ॥२०॥

भावार्थ : सूर्य का वसन्तसम्पात बिन्दु निज स्थान है और ध्रुव का उत्तर में तीन राशि परे है। छः राशियों के चाप को शर-बाण तीन राशि पर चाप में खड़ा होता है। जब उधर दृष्ट होगा, दिखाई पड़ेगा, उत्तरी ध्रुव के पास पहुँचता है ॥२०॥