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Rigveda / 10 / 87 / 13

यद॑ग्ने अ॒द्य मि॑थु॒ना शपा॑तो॒ यद्वा॒चस्तृ॒ष्टं ज॒नय॑न्त रे॒भाः । म॒न्योर्मन॑सः शर॒व्या॒३॒॑ जाय॑ते॒ या तया॑ विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 87 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : पायुः | देवता : अग्नी रक्षोहा | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यत् । अ॒ग्ने॒ । अ॒द्य । मि॒थु॒ना । शपा॑तः । यत् । वा॒चः । तृ॒ष्टम् । ज॒नय॑न्त । रे॒भाः । म॒न्योः । मन॑सः । श॒र॒व्या॑ । जाय॑ते । या । तया॑ । वि॒ध्य॒ । हृद॑ये । या॒तु॒ऽधाना॑न् ॥ १०.८७.१३

पदार्थ : (अग्ने) हे तेजस्वी नायक ! (यत्-अद्य) जब आज-इस समय (मिथुना शपातः) दो परस्पर शब्द करते हैं (यत्) या जब (रेभाः) बहुत शब्दायमान (वाचः तृष्टं जनयन्त) वाणी के तृष्णाजनक वचन कटु वचन को उत्पन्न करते हैं, उस अवसर पर जो मन्यु उत्पन्न होता है (मन्योः-मनसः) मन्युरूप मन से (शरव्या या जायते) जो इषु-बाण तैयार होता है, (तया यातुधानान् हृदये विध्य) उससे पीड़ा देनेवालों को हृदय में ताड़ित कर ॥१३॥

भावार्थ : कटु वचन बोलनेवालों के हृदय में शस्त्र के द्वारा बींध देना चाहिये ॥१३॥