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Rigveda / 1 / 187 / 6

त्वे पि॑तो म॒हानां॑ दे॒वानां॒ मनो॑ हि॒तम्। अका॑रि॒ चारु॑ के॒तुना॒ तवाहि॒मव॑सावधीत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 187 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : ओषधयः | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वे। पि॒तो॒ इति॑। म॒हाना॑म्। दे॒वाना॑म्। मनः॑। हि॒तम्। अका॑रि। चारु॑। के॒तुना॑। तव॑। अहि॑म्। अव॑सा। अ॒व॒धी॒त् ॥ १.१८७.६

पदार्थ : हे (पितो) अन्नव्यापी पालना करनेवाले ईश्वर ! (तव) जिस आपकी (अवसा) रक्षा आदि से सूर्य (अहिम) मेघ को (अवधीत्) हन्ता है उन आपके (केतुना) विज्ञान से जो (चारु) श्रेष्ठतर (अकारि) किया जाता है वह (महानाम्) महात्मा पूज्य (देवानाम्) विद्वानों का (मनः) मन (त्वे) आप में (हितम्) धरा है वा प्रसन्न है ॥ ६ ॥

भावार्थ : यदि अन्न भोजन न किया जाय तो किसी का मन आनन्दित न हो क्योंकि मन अन्नमय है। इस कारण जिसकी उत्पत्ति के लिये मेघ निमित्त है, उस अन्न को सुन्दरता से बनाकर भोजन करना चाहिये ॥ ६ ॥