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Rigveda / 10 / 88 / 7

दृ॒शेन्यो॒ यो म॑हि॒ना समि॒द्धोऽरो॑चत दि॒वियो॑निर्वि॒भावा॑ । तस्मि॑न्न॒ग्नौ सू॑क्तवा॒केन॑ दे॒वा ह॒विर्विश्व॒ आजु॑हवुस्तनू॒पाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 88 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : मूर्धन्वानाङ्गिरसो वामदेव्यो वा | देवता : सूर्यवैश्वानरौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : दृ॒शेन्यः॑ । यः । म॒हि॒ना । स॒म्ऽइ॒द्धः । अरो॑चत । दि॒विऽयो॑निः । वि॒भाऽवा॑ । तस्मि॑न् । अ॒ग्नौ । सू॒क्त॒ऽवा॒केन॑ । दे॒वाः । ह॒विः । विश्वे॑ । आ । अ॒जु॒ह॒वुः॒ । त॒नू॒ऽपाः ॥ १०.८८.७

पदार्थ : (दिवियोनिः) आकाश में आश्रय सूर्य है जिसका, ऐसा अग्नि (समिद्धः) प्रज्ज्वलित हुआ (यः-महिम्ना दृशेन्यः) जो अपने महत्त्व से दर्शनीय है (विभावा-अरोचत) प्रकट दीप्तिवाला प्रकाशमान हो जाता है (तस्मिन्-अग्नौ) उस यज्ञाग्नि में (तनूपाः-विश्वेदेवाः) शरीररक्षक सब विद्वान् (सूक्तवाकेन) वचनसंस्था-मन्त्रक्रमिकता से (हविः-आजुहवुः) घृतादिक भली-भाँति होमते हैं ॥७॥

भावार्थ : पृथिवीस्थ अग्नि सदा आकाश के सूर्य को उन्मुख हो प्रज्ज्वलित होती है, उसे वेदि में घृतादि होम्य वस्तु देनी चाहिए अपने शरीर की रक्षा करने के लिये ॥७॥