Rigveda / 10 / 89 / 3
स॒मा॒नम॑स्मा॒ अन॑पावृदर्च क्ष्म॒या दि॒वो अस॑मं॒ ब्रह्म॒ नव्य॑म् । वि यः पृ॒ष्ठेव॒ जनि॑मान्य॒र्य इन्द्र॑श्चि॒काय॒ न सखा॑यमी॒षे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 89 | Mantra No : 3
In English:
Seer : reNuH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : samaanamasmaa anapaavRRidarcha kShmayaa divo asama.m brahma navyam . vi yaH pRRiShTheva janimaanyarya indrashchikaaya na sakhaayamiiShe .
Component Words : samaanam . asmai . anapa.avRRit . archa . kShmayaa . divaH . asamam . brahma . navyam . vi . yaH . pRRiShThaa.aiva . janimaani . aryaH . indraH . chikaaya . na . sakhaayam . iiShe . 10.89.3
In Hindi:
ऋषि : रेणुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : स॒मा॒नम् । अ॒स्मै॒ । अन॑पऽवृत् । अ॒र्च॒ । क्ष्म॒या । दि॒वः । अस॑मम् । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । वि । यः । पृ॒ष्ठाऽइ॑व । जनि॑मानि । अ॒र्यः । इन्द्रः॑ । चि॒काय॑ । न । सखा॑यम् । ई॒षे ॥ १०.८९.३
पदार्थ : (यः) जो (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (अर्यः) सारे जगत् का स्वामी (पृष्ठा-इव जनिमानि) जायमान जीवात्माओं को (वि चिकाय) विशेषरूप से जानता है (सखायं न-ईषते) वह अपने उपासक सखा को हिंसित नहीं करता है (ब्रह्म) वह ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है (नव्यम्) वह ब्रह्म स्तुति करने योग्य है (समानम्) सबके लिये समान है निष्पक्ष है (अनपवृत्) पृथक् नहीं किन्तु सर्वान्तर्यामी है (क्ष्मया दिवः-असमम्) पृथिवी से द्युलोक से समता रखनेवाला-एकदेशी नहीं है (अस्मै) इसके लिये (अर्च) स्तुति कर ॥३॥
भावार्थ : परमात्मा जगत् का स्वामी महान् आत्माओं को जाननेवाला सर्वान्तर्यामी निष्पक्ष है, उसकी स्तुति करनी चाहिए ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : रेणुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : स॒मा॒नम् । अ॒स्मै॒ । अन॑पऽवृत् । अ॒र्च॒ । क्ष्म॒या । दि॒वः । अस॑मम् । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । वि । यः । पृ॒ष्ठाऽइ॑व । जनि॑मानि । अ॒र्यः । इन्द्रः॑ । चि॒काय॑ । न । सखा॑यम् । ई॒षे ॥ १०.८९.३
भावार्थ :