Rigveda / 10 / 90 / 8
तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒: सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम् । प॒शून्ताँश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्यान्ग्रा॒म्याश्च॒ ये ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 90 | Mantra No : 8
In English:
Seer : naaraayaNaH | Devta : puruShaH | Metre : viraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tasmaadyaj~naatsarvahutaH sambhRRita.m pRRiShadaajyam . pashuuntaa.Nshchakre vaayavyaanaaraNyaangraamyaashcha ye .
Component Words : tasmaat . yaj~naat . sarva.ahutaH . sam.abhRRitam . pRRiShat.aaajyam . pashuun . taan . chakre . vaayavyaan . aaraNyaan . graamyaaH . cha . ye . 10.90.8
In Hindi:
ऋषि : नारायणः | देवता : पुरुषः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : तस्मा॑त् । य॒ज्ञात् । स॒र्व॒ऽहुतः॑ । सम्ऽभृ॑तम् । पृ॒ष॒त्ऽआ॒ज्यम् । प॒शून् । तान् । च॒क्रे॒ । वा॒य॒व्या॑न् । आ॒र॒ण्यान् । ग्रा॒म्याः । च॒ । ये ॥ १०.९०.८
पदार्थ : (तस्मात् सर्वहुतः-यज्ञात्) उस जिसमें सब जगत् प्रलय में हुत अर्थात् लीन हो जाता है या सबके द्वारा हूयमान ग्रहण करने योग्य परमात्मा है, उस यजनीय से (पृषदाज्यम्) अन्न रस (सम्भृतम्) सम्यक् निष्पन्न होता है, तथा (तान्) उन (पशून्) पशुओं को (वायव्यान्) पक्षियों को (चक्रे) उत्पन्न करता है (च) और (ये-आरण्याः ग्राम्याः) जो जङ्गल के और ग्राम के पशु-पक्षी हैं, उन सबको उत्पन्न करता है ॥८॥
भावार्थ : परमात्मा के अन्दर यह सारा जगत् प्रलयकाल में लीन हो जाता है तथा जो सबके द्वारा उपासना करने योग्य है, वह ऐसा परमात्मा अन्न रसमयी ओषधियों को उत्पन्न करता है तथा जङ्गल और नगर के पशु-पक्षियों को उत्पन्न करता है, मानने योग्य है ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : नारायणः | देवता : पुरुषः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : तस्मा॑त् । य॒ज्ञात् । स॒र्व॒ऽहुतः॑ । सम्ऽभृ॑तम् । पृ॒ष॒त्ऽआ॒ज्यम् । प॒शून् । तान् । च॒क्रे॒ । वा॒य॒व्या॑न् । आ॒र॒ण्यान् । ग्रा॒म्याः । च॒ । ये ॥ १०.९०.८
भावार्थ :