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Rigveda / 10 / 91 / 10

तवा॑ग्ने हो॒त्रं तव॑ पो॒त्रमृ॒त्वियं॒ तव॑ ने॒ष्ट्रं त्वम॒ग्निदृ॑ताय॒तः । तव॑ प्रशा॒स्त्रं त्वम॑ध्वरीयसि ब्र॒ह्मा चासि॑ गृ॒हप॑तिश्च नो॒ दमे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 91 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अरुणो वैतहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : तव॑ । अ॒ग्ने॒ । हो॒त्रम् । तव॑ । पो॒त्रम् । ऋ॒त्विय॑म् । तव॑ । ने॒ष्ट्रम् । त्वम् । अ॒ग्नित् । ऋ॒त॒ऽय॒तः । तव॑ । प्र॒ऽशा॒स्त्रम् । त्वम् । अ॒ध्व॒रि॒ऽय॒सि॒ । ब्र॒ह्मा । च॒ । असि॑ । गृ॒हऽप॑तिः । च॒ । नः॒ । दमे॑ ॥ १०.९१.१०

पदार्थ : (अग्ने) हे परमात्मन् ! इस अध्यात्मयज्ञ में (तव होत्रम्) तेरा होतृकर्म है, इससे तू ही इसका होता है। (तव-ऋत्वियं पोत्रम्) तेरा ऋतु के अनुसार पोतृकर्म है, जिससे तू ही शोधनकर्म विधाता है (तव नेष्ट्रम्) तेरा नेष्टृकर्म है, तू ही नेष्टा-नेता अध्यात्मयज्ञ का है (त्वम्-अग्नित्) तू पुरोहित है (ऋतायतः) अध्यात्मयज्ञ करते हुए उपासक का (तव प्रशास्त्रम्) तेरा प्रशास्तृकर्म है, क्योंकि की तू ही प्रशास्ता उत्तम उपदेष्टा है, (त्वम्-अध्वरीयसि) तू हमारे अध्यात्मयज्ञ को चाहता है, अतः तू अध्वर्यु है (ब्रह्मा च-असि) और तू ब्रह्मा भी है तथा (नः-दमे गृहपतिः) तू हमारे हृदयघर में गृहस्वामी है ॥१०॥

भावार्थ : अध्यात्मयज्ञ में समस्त ऋत्विजों, समस्त श्रेष्ठ याजकों का पद परमात्मा ही प्राप्त किये हुए है ॥१०॥