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Rigveda / 10 / 91 / 12

इ॒मा अ॑स्मै म॒तयो॒ वाचो॑ अ॒स्मदाँ ऋचो॒ गिर॑: सुष्टु॒तय॒: सम॑ग्मत । व॒सू॒यवो॒ वस॑वे जा॒तवे॑दसे वृ॒द्धासु॑ चि॒द्वर्ध॑नो॒ यासु॑ चा॒कन॑त् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 91 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अरुणो वैतहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : इ॒माः । अ॒स्मै॒ । म॒तयः॑ । वाचः॑ । अ॒स्मत् । आ । ऋचः॑ । गिरः॑ । सु॒ऽस्तु॒तयः॑ । सम् । अ॒ग्म॒त॒ । व॒सु॒ऽयवः॑ । वस॑वे । जा॒तऽवे॑दः । वृ॒द्धासु॑ । चि॒त् । वर्ध॑नः । यासु॑ । चा॒कन॑त् ॥ १०.९१.१२

पदार्थ : (अस्मै वसवे जातवेदसे) इस मोक्ष में वसानेवाले उत्पन्नमात्र के जाननेवाले सर्वज्ञ परमात्मा के लिए (अस्मत्) हमारी (इमाः) ये (मतयः) मननक्रियाएँ-बुद्धियाँ (वाचः) वाणियाँ (ऋचः) स्तुतियाँ (गिरः) गीतियाँ (सुष्टुतयः) शोभनस्तुति करनेवाले जिनके हैं, ऐसी सब (वसुयवः) मोक्षवास के हेतुभूत (सम् अग्मत) सङ्गत होती हैं (यासु वृद्धासु) जिन वृद्ध प्रवृद्ध हुई में (चित्) अवश्य (वर्धनः-चाकनत्) वह वर्धमान परमात्मा स्तुतिकर्त्ताओं को चाहता है-अपनाता है ॥१२॥

भावार्थ : मोक्षप्राप्ति के वेदवाणियों का उच्चारण, मनन तथा उसकी स्तुतियाँ प्रेम भरी गीतियाँ परमात्मा को समर्पित करनी चाहिये। वह ऐसे स्तुति करनेवाले को अपनाता है ॥१२॥