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Rigveda / 10 / 92 / 11

ते हि द्यावा॑पृथि॒वी भूरि॑रेतसा॒ नरा॒शंस॒श्चतु॑रङ्गो य॒मोऽदि॑तिः । दे॒वस्त्वष्टा॑ द्रविणो॒दा ऋ॑भु॒क्षण॒: प्र रो॑द॒सी म॒रुतो॒ विष्णु॑रर्हिरे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 92 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : शार्यातो मानवः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ते । हि । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । भूरि॑ऽरेतसा । नरा॒शंसः॑ । चतुः॑ऽअङ्गः । य॒मः । अदि॑तिः । दे॒वः । त्वष्टा॑ । द्र॒वि॒णः॒ऽदाः । ऋ॒भु॒क्षणः॑ । प्र । रो॒द॒सी इति॑ । म॒रुतः॑ । विष्णुः॑ । अ॒र्हि॒रे॒ ॥ १०.९२.११

पदार्थ : (ते हि भूरिरेतसा द्यावापृथिवी) वे ही बहुत सन्तान बीज शक्तिवाले माता-पिता (नराशंसः) मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय (चतुरङ्गः) चारों वेदों को जाननेवाला चतुर्वेदवित् (यमः) संयमी जितेन्द्रिय जन (अदितिः) अखण्डित बुद्धिवाला (त्वष्टा देवः) शिल्पी विद्वान् (द्रविणोदाः) धनदाता-दानी (ऋभुक्षणः) महान् सम्राट् (रोदसी) कुल या देश के शोधन करनेवाले-बाधकों का निवारण करनेवाले पुरोहित और रक्षक कर्मचारी या सैनिक प्रहरी (मरुतः) ऋत्विग्जन (विष्णुः) व्यापक परमात्मा, ये सब (प्र-अर्हिरे) पूजे जावें ॥११॥

भावार्थ : कुल में या देश में वीर्यशक्तिसम्पन्न स्त्री-पुरुष, प्रशंसनीय चारों वेदों का जाननेवाला जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, प्रखर बुद्धिमान्, शिल्पी कलाकार, दानीजन, दुःखबाधानिवारक, समय-समय श्रेष्ठ कर्म करानेवाले तथा सर्वव्यापक परमात्मा पूजा के योग्य हैं ॥११॥