Rigveda / 10 / 94 / 7
दशा॑वनिभ्यो॒ दश॑कक्ष्येभ्यो॒ दश॑योक्त्रेभ्यो॒ दश॑योजनेभ्यः । दशा॑भीशुभ्यो अर्चता॒जरे॑भ्यो॒ दश॒ धुरो॒ दश॑ यु॒क्ता वह॑द्भ्यः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 94 | Mantra No : 7
In English:
Seer : arbudaH kaadraveyaH sarpaH | Devta : graavaaNaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : dashaavanibhyo dashakakShyebhyo dashayoktrebhyo dashayojanebhyaH . dashaabhiishubhyo archataajarebhyo dasha dhuro dasha yuktaa vahadbhyaH .
Component Words : dashaavani.abhyaH . dashakakShyebhyaH . dasha.ayoktrebhyaH . dasha.ayojanebhyaH . dashaabhiishu.abhyaH . archata . ajarebhyaH . dasha . dhuraH . dasha . yuktaaH . vahat.abhyaH . 10.94.7
In Hindi:
ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : दशा॑वनिऽभ्यः॑ । दश॑कक्ष्येभ्यः । दश॑ऽयोक्त्रेभ्यः । दश॑ऽयोजनेभ्यः । दशा॑भीशुऽभ्यः । अ॒र्च॒त॒ । अ॒जरे॑भ्यः । दश॑ । धुरः॑ । दश॑ । यु॒क्ताः । वह॑त्ऽभ्यः ॥ १०.९४.७
पदार्थ : (दशावनिभ्यः) दश कर्मों की रक्षा करनेवाली अङ्गुलियाँ जिनकी हैं, ऐसे विद्वानों को (दशकक्ष्येभ्यः) दशकर्म को प्रकाशित करनेवाली अङ्गुलियाँ जिनकी हैं, ऐसे विद्वानों को (दशयोक्त्रेभ्यः) दश संयोग करनेवाली अङ्गुलियाँ जिनकी हैं, ऐसे विद्वानों को (दशयोजनेभ्यः) दश यथायोग्य योजनाएँ करनेवाली अङ्गुलियाँ जिनकी हैं, ऐसे विद्वानों को (दशाभीशुभ्यः) दश कर्मों में व्यापनधर्मी अङ्गुलियाँ जिनकी हैं, ऐसे विद्वानों को (दश-धुरः) शत्रुओं का विध्वंस करनेवाली दश अङ्गुलियों से इस प्रकार दश कार्यविभागों से युक्त योग्य संलग्न दश महानुभावों को (अजरेभ्यः) जरारहित युवकों को (वहद्भ्यः) राज प्रजा के कार्यों को वहन करनेवाले राजप्रतिनिधि और प्रजाप्रतिनिधियों को (अर्चत) सत्कृत करो, उनकी आज्ञा का पालन करो, उनमें पाँच राजप्रतिनिधि-राज्यमन्त्री, गृहमन्त्री, अर्थमन्त्री, सैन्यबलमन्त्री और विदेशमन्त्री तथा प्रजाप्रतिनिधि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र और निषाद-वनवासी पाँचों के पाँच मुख्य जन राष्ट्र के संचालन में आवश्यक हैं ॥७॥
भावार्थ : राष्ट्र के संचालन में पाँच राष्ट्र के अधिकारी प्रतिनिधि-राज्यमन्त्री, गृहमन्त्री, अर्थमन्त्री, सैन्यमन्त्री, विदेशमन्त्री और प्रजा के प्रतिनिधि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र निषाद-वनवासी प्रत्येक के मुख्य जन होने चाहिए ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : दशा॑वनिऽभ्यः॑ । दश॑कक्ष्येभ्यः । दश॑ऽयोक्त्रेभ्यः । दश॑ऽयोजनेभ्यः । दशा॑भीशुऽभ्यः । अ॒र्च॒त॒ । अ॒जरे॑भ्यः । दश॑ । धुरः॑ । दश॑ । यु॒क्ताः । वह॑त्ऽभ्यः ॥ १०.९४.७
भावार्थ :