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Rigveda / 10 / 94 / 10

वृषा॑ वो अं॒शुर्न किला॑ रिषाथ॒नेळा॑वन्त॒: सद॒मित्स्थ॒नाशि॑ताः । रै॒व॒त्येव॒ मह॑सा॒ चार॑वः स्थन॒ यस्य॑ ग्रावाणो॒ अजु॑षध्वमध्व॒रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 94 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : वृषा॑ । वः॒ । अं॒शुः । न । किल॑ । रि॒षा॒थ॒न॒ । इळा॑ऽवन्तः । सद॑म् । इत् । स्थ॒न॒ । आशि॑ताः । रै॒व॒त्याऽइ॑व । मह॑सा । चार॑वः । स्थ॒न॒ । यस्य॑ । ग्रा॒वा॒णः॒ । अजु॑षध्वम् । अ॒ध्व॒रम् ॥ १०.९४.१०

पदार्थ : (ग्रावाणः) हे विद्वानों ! (यस्य) जिस परमात्मा के (अध्वरम्) अहिंसनीय अध्यात्मयज्ञ को (अजुषध्वम्) तुम सेवन करते हो (वः) तुम्हारे लिए (वृषा-अंशुः) सुखवर्षक आनन्दप्रवाह प्राप्त होता है (न किल रिषाथन) उससे कदापि तुम हिंसित नहीं होते (इळावन्तः) तुम स्तुतिवाले-स्तुति करनेवाले होते हुए (सदम्-इत्) सदा ही (आशिताः-स्थन) उस आनन्द के भोक्ता बने रहते हो (रैवत्या-इव महसा) धनवालों की जो धनवत्ता है, उस जैसी स्व महत्ता से (चारवः-स्थन) कल्याणरूप हो ॥१०॥

भावार्थ : विद्वान् लोग परमात्मा के अध्यात्मयज्ञ का सेवन करते हैं, तब महान् आनन्दप्रवाह प्राप्त होता है। उससे वे हिंसित नहीं होते, अपितु धनवालों की धनवत्ता के समान महती अध्यात्मसम्पत्ति से युक्त होकर महान् आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥१०॥