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Rigveda / 10 / 94 / 12

ध्रु॒वा ए॒व व॑: पि॒तरो॑ यु॒गेयु॑गे॒ क्षेम॑कामास॒: सद॑सो॒ न यु॑ञ्जते । अ॒जु॒र्यासो॑ हरि॒षाचो॑ ह॒रिद्र॑व॒ आ द्यां रवे॑ण पृथि॒वीम॑शुश्रवुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 94 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ध्रु॒वाः । ए॒व । वः॒ । पि॒तरः॑ । यु॒गेऽयु॑गे । क्षेम॑ऽकामासः । सद॑सः । न । यु॒ञ्ज॒ते॒ । अ॒जु॒र्यासः॑ । ह॒रि॒ऽसाचः॑ । ह॒रिद्र॑वः । आ । द्याम् । रवे॑ण । पृ॒थि॒वीम् । अ॒शु॒श्र॒वुः॒ ॥ १०.९४.१२

पदार्थ : (वः) हे विद्वानों ! तुम (ध्रुवाः पितरः) स्थिर रक्षक हो (युगे युगे) अवसर-अवसर पर (क्षेमकामासः) हमारे लिये कल्याणकामना करनेवाले हो-करते रहते हो (सदसः न युञ्जते) हमारे गृहसदस्य जैसे सहयोग करते हैं, वैसे तुम भी सहयोग करते रहो (अजुर्यासः) अजीर्ण-सदा युवा रहते हुए (हरिषाचः) मनुष्यों से मेल करनेवाले (हरिद्रवः) मनुष्यों को सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाले (रवेण) उपदेश से (द्याम्) पितृलोक-पुरुषवर्ग को (पृथिवीम्) मातृलोक-स्त्रीवर्ग को (आ-अशुश्रवुः) आपूर भरपूर करो ॥१२॥

भावार्थ : विद्वान् महानुभाव गृहस्थों की कल्याणकामना करनेवाले घर के सदस्यों के समान समय-समय पर घरों में अपना समागम लाभ दें, उपदेश करें, पुरुष स्त्रियों को ज्ञानपूर्ण बनावें ॥१२॥