Rigveda / 10 / 95 / 10
वि॒द्युन्न या पत॑न्ती॒ दवि॑द्यो॒द्भर॑न्ती मे॒ अप्या॒ काम्या॑नि । जनि॑ष्टो अ॒पो नर्य॒: सुजा॑त॒: प्रोर्वशी॑ तिरत दी॒र्घमायु॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 95 | Mantra No : 10
In English:
Seer : puruuravaa aiLaH | Devta : urvashii | Metre : bhurigaarchiitriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : vidyunna yaa patantii davidyodbharantii me apyaa kaamyaani . janiShTo apo naryaH sujaataH prorvashii tirata diirghamaayuH .
Component Words : vi.adyut . na . yaa . patantii . davidyot . bharantii . me . apyaa . kaamyaani . janiShTo iti . apaH . naryaH . su.ajaataH . pra . urvashii . tirata . diirgham . aayuH . 10.95.10
In Hindi:
ऋषि : पुरूरवा ऐळः | देवता : उर्वशी | छन्द : भुरिगार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : वि॒ऽद्युत् । न । या । पत॑न्ती । दवि॑द्योत् । भर॑न्ती । मे॒ । अप्या॑ । काम्या॑नि । जनि॑ष्टो॒ इति॑ । अ॒पः । नर्यः॑ । सुऽजा॑तः । प्र । उ॒र्वशी॑ । ति॒र॒त॒ । दी॒र्घम् । आयुः॑ ॥ १०.९५.१०
पदार्थ : (या-उर्वशी) जो बहुत सुख भोगों को भोगती-भुगाती हुई प्राप्त होती है, वह बहुत कमनीय स्त्री या प्रजा (विद्युत्-न पतन्ती) विद्युत् की भाँति सुखवृष्टि गिराती है (दविद्योत्) जो स्वगुणों से चमकती है घर में या राष्ट्र में (मे) मेरे लिए-मुझ गृहपति या राष्ट्रपति के लिए (अप्या काम्यानि भरन्ती) आप्तव्य या कर्मसाध्य कमनीय सुखों को धारण करती हुई वर्त्तमान है (अपः-नर्यः-सुजातः-जनिष्ट) मानव के आन्तरिक जलों में नरहित नर के लिए उपयुक्त शुक्र-धातु सुप्रसिद्ध पुत्ररूप में रस के अन्दर उत्पन्न होता है तथा जल से अभिषेककाल में नरों के लिए हितकर पुत्रसमान नरक दुःख से त्राण करनेवाला राजा सुप्रसिद्ध युवराज हो जाता है, (उर्वशी दीर्घमायुः-प्रतिरत) वह बहुकमनीय स्त्री या प्रजा गृहपति या प्रजापति की आयु को बढ़ाती है सहयोग, संयम, सदाचार द्वारा स्वयं रहती, मुझे रखती हुई ॥१०॥
भावार्थ : आदर्श पत्नी बहुत सुख भोगों को भोगने और भोगानेवाली होती है। घर में सुख की वृष्टि करती है और अपने गुणों से प्रकाशमान होती है, ऐसी पत्नी पति के कर्म द्वारा प्राप्त होती है, मानव के अन्दर जो जीवनरस है, उससे पुत्र की प्राप्ति कराती है। अच्छी पत्नी परिवार में दीर्घायु का विस्तार करती है एवं अच्छी प्रजा सुख भोगने और भोगानेवाली होती है, राष्ट्र में सुख का संचार करती है, गुणों से प्रकाशमान होती है, ऐसी प्रजा राजा के अच्छे शासन से बनती है। योग्य राजा प्रजा की ओर से अभिषिक्त किया जाता है, तब प्रजा को दुःखों से बचाता है, अच्छी प्रजा भी राष्ट्र में दीर्घायु का विस्तार करती है ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : पुरूरवा ऐळः | देवता : उर्वशी | छन्द : भुरिगार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : वि॒ऽद्युत् । न । या । पत॑न्ती । दवि॑द्योत् । भर॑न्ती । मे॒ । अप्या॑ । काम्या॑नि । जनि॑ष्टो॒ इति॑ । अ॒पः । नर्यः॑ । सुऽजा॑तः । प्र । उ॒र्वशी॑ । ति॒र॒त॒ । दी॒र्घम् । आयुः॑ ॥ १०.९५.१०
भावार्थ :