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Rigveda / 10 / 98 / 10

ए॒तान्य॑ग्ने नव॒तिर्नव॒ त्वे आहु॑ता॒न्यधि॑रथा स॒हस्रा॑ । तेभि॑र्वर्धस्व त॒न्व॑: शूर पू॒र्वीर्दि॒वो नो॑ वृ॒ष्टिमि॑षि॒तो रि॑रीहि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 98 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : देवापिरार्ष्टिषेणः | देवता : देवाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒तानि॑ । अ॒ग्ने॒ । न॒व॒तिः । नव॑ । त्वे इति॑ । आऽहु॑तानि । अधि॑ऽरथा । स॒हस्रा॑ । तेभिः॑ । व॒र्ध॒स्व॒ । त॒न्वः॑ । शू॒र॒ । पू॒र्वीः । दि॒वः । नः॒ । वृ॒ष्टिम् । इ॒षि॒तः । रि॒री॒हि॒ ॥ १०.९८.१०

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (एतानि) ये (नवतिः-नव) निन्यानवे वर्ष जीवन के, सौवें वर्ष में मृत्यु हो जाती है, सामान्य शास्त्रनियम से जीवन के निन्यानवे वर्ष, जो ऐहिक-सांसारिक हैं, वे (अधिरथा सहस्रा) रमणीय मोक्षसम्बन्धी असंख्य अर्थात् अनन्त निन्यानवे वर्ष हो जाते हैं, (त्वे) तुझ में (आहुतानि) आश्रित हैं (तेभिः) उन अनन्त निन्यानवे वर्षों के द्वारा (पूर्वीः) श्रेष्ठ-अलौकिक मोक्षसम्बन्धी (तन्वः) देहों-ब्राह्मशरीरों को (वर्धस्व) बढ़ा-पुष्ट कर (नः) हमारे लिये (दूषितः) उपासित हुआ (दिवः) मोक्षधाम से (वृष्टिम्) आनन्दवृष्टि को (रिरीहि) प्रेरित कर, उसका दृश्य दिखा ॥१०॥

भावार्थ : मानव के जीवनसम्बन्धी सांसारिक वर्ष शास्त्रीय दृष्टि से सौवें वर्ष में मृत्यु हो जाने पर निन्यानवें वर्ष रह जाते हैं, वे रमणीय मोक्षसम्बन्धी असंख्य अनन्त गुणित निन्यानवें बन जाते हैं अर्थात् अनन्त निन्यानवें वर्ष बन जाते हैं, जो परमात्मा के आश्रय में होते हैं, वे अलौकिक ब्राह्म-ब्रह्म के आधार पर देहों में-शरीरों में परमात्मा द्वारा पुष्ट होते हैं ॥१०॥