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Rigveda / 10 / 99 / 10

अ॒यं द॑श॒स्यन्नर्ये॑भिरस्य द॒स्मो दे॒वेभि॒र्वरु॑णो॒ न मा॒यी । अ॒यं क॒नीन॑ ऋतु॒पा अ॑वे॒द्यमि॑मीता॒ररुं॒ यश्चतु॑ष्पात् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 99 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वम्रो वैखानसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । द॒श॒स्यन् । नर्ये॑भिः । अ॒स्य॒ । द॒स्मः । दे॒वेभिः॑ । वरु॑णः । न । मा॒यी । अ॒यम् । क॒नीनः॑ । ऋ॒तु॒ऽपाः । अ॒वे॒दि॒ । अमि॑मीत । अ॒ररु॑म् । यः । चतुः॑ऽपात् ॥ १०.९९.१०

पदार्थ : (अयम्) यह परमात्मा (दस्मः) दर्शनीय (वरुणः) वरणीय (न) पदपूरण (मायी) प्रज्ञावान् (नर्येभिः) नरसम्बन्धी-मनुष्यसम्बन्धी (देवेभिः) इन्द्रियों से प्राणों से (दशस्यन्) दुष्ट के लिए दण्ड देता हुआ प्राणों से वियुक्त करता हुआ (अस्य) दण्ड फेंकता है (अयं कनीनः) यह कमनीय (ऋतुपाः) ऋतुओं का रक्षक-ऋतुप्रवर्तक (यः-चतुष्पात्) चार अवस्थावाला (अवेदि) जाना जाता है साक्षात् किया जाता है (अररुम्) काम शत्रु या दुष्टजन को (अमिमीत) हिंसित करता है ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा ऋतुसंचार करता है, दर्शनीय और वरने के योग्य है, दुष्ट जन को प्राणों से वियुक्त करता है, उपासक ज्ञाता द्वारा चार अवस्थाओं के रूप में साक्षात् होता है, अर्थात् स्थूल जगत् को देखकर, सूक्ष्मजगत् को देखकर प्रकृति को लक्ष्य कर और अपनी आत्मा को लक्ष्य करके जाना जाता है ॥१०॥