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Rigveda / 10 / 100 / 2

भरा॑य॒ सु भ॑रत भा॒गमृ॒त्वियं॒ प्र वा॒यवे॑ शुचि॒पे क्र॒न्ददि॑ष्टये । गौ॒रस्य॒ यः पय॑सः पी॒तिमा॑न॒श आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 100 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : दुवस्युर्वान्दनः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : भरा॑य । सु । भ॒र॒त॒ । भा॒गम् । ऋ॒त्विय॑म् । प्र । वा॒यवे॑ । शु॒चि॒ऽपे । क्र॒न्दत्ऽइ॑ष्टये । गौ॒रस्य॑ । यः । पय॑सः । पी॒तिम् । आ॒न॒शे । आ । स॒र्वऽता॑तिम् । अदि॑तिम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.१००.२

पदार्थ : (भराय) पोषक (शुचिपे) पवित्र या तेजस्वी ज्ञानरस पिलानेवाले (क्रन्ददिष्टये) स्तुति करनेवाले का अध्यात्मयज्ञ जिसके लिये है, उस (वायवे) वायुसमान जीवनप्रद-या ज्ञानस्वरूप परमात्मा के लिये (ऋत्वियम्) ऋतुप्राप्त समयानुकूल (भागम्) भजन-स्तुतिवचन (सुभरत) सुसम्पादन करो (यः) जो (गौरस्य) स्तुतिवाणी में रमनेवाले के (पयसः) उपासनारस का (पीतिम्-आनशे) पान प्राप्त करता है-स्वीकार करता है, उस (सर्वतातिम्) जगद्विस्तारक (अदितिम्) अनश्वर परमात्मा को (आ वृणीमहे) भलीभाँति वरते हैं-अपनाते हैं ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा पोषणकर्त्ता ज्ञानरस का पिलानेवाला जीवनप्रद है, जो उपासक स्तुति में रत है, यथासमय उपासना करता है, उसके उपासनारस को स्वीकार करता है, उस जगद्विस्तारक अविनाशी का मानना उसकी स्तुति करना अवश्य चाहिए ॥२॥