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Rigveda / 10 / 103 / 12

अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि । अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 103 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : अप्वा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒मीषा॑म् । चि॒त्तम् । प्र॒ति॒ऽलो॒भय॑न्ती । गृ॒हा॒ण । अङ्गा॑नि । अ॒प्वे॒ । परा॑ । इ॒हि॒ । अ॒भि । प्र । इ॒हि॒ । निः । द॒ह॒ । हृ॒त्ऽसु । शोकैः॑ । अ॒न्धेन॑ । अ॒मित्राः॑ । तम॑सा । स॒च॒न्ता॒म् ॥ १०.१०३.१२

पदार्थ : (अप्वे) हे स्वास्थ्य से गिरानेवाले रोग या शान्ति से गिरानेवाले भय ! (त्वम्) तू (परा इहि) यहाँ से परे हो जा-पृथक् हो जा (अमीषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तम्) चित्तों को-मनबुद्धि चित्त अहङ्कारों को (प्रतिलोभयन्ती) मूढ़ करते हुए (अङ्गानि) उनके अङ्गों को (गृहाण) पकड़ जकड़ शिथिल कर (अभि प्र इहि) उन्हें प्राप्त हो (शोकैः) सन्तापों से (हत्सु) हृदयों को (निर्दह) निर्दग्ध कर दे सर्वथा दग्ध कर दे (अमित्राः) शत्रुजन (अन्धेन) तमसा घने अन्धकार से (सचन्ताम्) संसक्त हो जावें ॥१२॥

भावार्थ : संग्राम में शत्रुओं के प्रति ऐसा ओषधियों का अस्त्रप्रयोग धूमरूप या वायुरूप-गैस फेंकना चाहिये, जो मानसिक रोग या भय को उत्पन्न कर दे, उनके मन आदि को दूषित तथा अन्य अङ्गों को निष्क्रिय-शिथिल बना दे, हृदयों को जलादे और घने अन्धकार में हुए जैसे बना दे ॥१२॥