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Rigveda / 10 / 107 / 7

दक्षि॒णाश्वं॒ दक्षि॑णा॒ गां द॑दाति॒ दक्षि॑णा च॒न्द्रमु॒त यद्धिर॑ण्यम् । दक्षि॒णान्नं॑ वनुते॒ यो न॑ आ॒त्मा दक्षि॑णां॒ वर्म॑ कृणुते विजा॒नन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 107 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या | देवता : दक्षिणा तद्दातारों वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : दक्षि॑णा । अश्व॑म् । दक्षि॑णा । गाम् । द॒दा॒ति॒ । दक्षि॑णा । च॒न्द्रम् । उ॒त । यत् । हिर॑ण्यम् । दक्षि॑णा । अन्न॑म् । व॒नु॒ते॒ । यः । नः॒ । आ॒त्मा । दक्षि॑णाम् । वर्म॑ । कृ॒णु॒ते॒ । वि॒ऽजा॒नन् ॥ १०.१०७.७

पदार्थ : जो जन (दक्षिणा) दक्षिणा में (अश्वम्) घोड़े को (दक्षिणा) दक्षिणा में (गाम्) गौ को (ददाति) देता है (दक्षिणा) दक्षिणा में (चन्द्रम्) आह्लादक चाँदी आदि श्वेत धातु (उत यत्) अथवा (हिरण्यम्) मनोहारी हितरमणीय स्वर्ण को (दक्षिणा) दक्षिणा में (अन्नं) अन्न को (वनुते) देता है (नः-आत्मा) वह दाता हमारा आत्मा है निज है-अपना है (विजानन्) विशेषरूप से जानता हुआ (दक्षिणां कवचं कृणुते) दक्षिणा को स्वकीय कवच-प्रहार का निवारक साधन करता है, बनाता है ॥७॥

भावार्थ : दक्षिणा में घोड़ा, गौ, चाँदी, सोना अन्न देना श्रेयस्कर है, इस प्रकार दक्षिणा देनेवाला अन्य जनों का आत्मा बन जाता है, उसे कोई पीड़ा नहीं पहुँचाता है तथा उसको दक्षिणा देना उसके लिए पापनिवारक कवच बन जाता है ॥७॥