Rigveda / 10 / 108 / 10
नाहं वे॑द भ्रातृ॒त्वं नो स्व॑सृ॒त्वमिन्द्रो॑ विदु॒रङ्गि॑रसश्च घो॒राः । गोका॑मा मे अच्छदय॒न्यदाय॒मपात॑ इत पणयो॒ वरी॑यः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 108 | Mantra No : 10
In English:
Seer : saramaa devashunii | Devta : praNayaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : naaha.m veda bhraatRRitva.m no svasRRitvamindro vidura~Ngirasashcha ghoraaH . gokaamaa me achChadayanyadaayamapaata ita paNayo variiyaH .
Component Words : na . aham . veda . bhraatRRi.atvam . no iti . svasRRi.atvam . indraH . viduH . a~NgirasaH . cha . ghoraaH . go.akaamaaH . me . achChadayan . yat . aayam . apa . ataH . ita . paNayaH . variiyaH . 10.108.10
In Hindi:
ऋषि : सरमा देवशुनी | देवता : प्रणयः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : न । अ॒हम् । वे॒द॒ । भ्रा॒तृ॒ऽत्वम् । नो इति॑ । स्व॒सृ॒ऽत्वम् । इन्द्रः॑ । वि॒दुः॒ । अङ्गि॑रसः । च॒ । घो॒राः । गोऽका॑माः । मे॒ । अ॒च्छ॒द॒य॒न् । यत् । आय॑म् । अप॑ । अतः॑ । इ॒त॒ । प॒ण॒यः॒ । वरी॑यः ॥ १०.१०८.१०
पदार्थ : (पणयः) हे वणिजों की भाँति जलरक्षकों मेघों ! (अहं भ्रातृत्वं न वेद) मैं तुम लोगों के भ्रातृभाव को नहीं जानती हूँ, नहीं मानती हूँ (न-उ स्वसृत्वम्) नहीं तुम्हारी भगिनी हूँ, ऐसा जानती हूँ और न मानती हूँ (इन्द्रः) विद्युद्देव (च) तथा (घोराः-अङ्गिरसः) शक्तिमान् विद्युन्मय वायुएँ (विदुः) जानें या मानें, मैं जानने या मानने में स्वतन्त्र नहीं हूँ (मे गोकामाः-अच्छदयन्) मेरे शासक जल चाहनेवाले तुम पर छा जावें-आक्रमण करें-छा जायेंगे-आक्रमण करेंगे (यत्-आयम्) जिनके पास से मैं आई हूँ (अतः) इस स्थान से (वरीयः) अति दूर (अप-इत) चले जाओ ॥१०॥ आध्यात्मिकयोजना−हे विषयव्यवहारप्रवर्तक इन्द्रिय प्राण ! मैं चेतना तुम्हारे साथ भ्रातृभाव को नहीं मानती हूँ, न स्वसृभाव-बहिन का नाता मान्ती हूँ, किन्तु ऐश्वर्यवान् परमात्मा के प्रबल नियम जानें, वे मेरे शासक हैं, जिसके लिये विषय-प्रवृत्तियाँ हैं, जिससे मैं शरीर में आई हूँ, वे तुम्हें पृथक कर देंगे, यहाँ से दूरातिदूर चले जाओ ॥१०॥
भावार्थ : अनाधिकृत वस्तु को अपने अधिकार में लेनेवाले समझाने के लिये कोई जावें, तो उनके प्रलोभन में न आकर उचित बात ही समझाया करें ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : सरमा देवशुनी | देवता : प्रणयः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : न । अ॒हम् । वे॒द॒ । भ्रा॒तृ॒ऽत्वम् । नो इति॑ । स्व॒सृ॒ऽत्वम् । इन्द्रः॑ । वि॒दुः॒ । अङ्गि॑रसः । च॒ । घो॒राः । गोऽका॑माः । मे॒ । अ॒च्छ॒द॒य॒न् । यत् । आय॑म् । अप॑ । अतः॑ । इ॒त॒ । प॒ण॒यः॒ । वरी॑यः ॥ १०.१०८.१०
भावार्थ :