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Rigveda / 10 / 110 / 4

प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यत॒र अग्रे॒ अह्ना॑म् । व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ अदि॑तये स्यो॒नम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 110 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : जम्दग्नी रामो वा | देवता : आप्रियः | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्रा॒चीन॑म् । ब॒र्हिः । प्र॒ऽदिशा॑ । पृ॒थि॒व्याः । वस्तोः॑ । अ॒स्याः । वृ॒ज्य॒ते॒ । अग्रे॑ । अह्ना॑म् । वि । ऊँ॒ इति॑ । प्र॒थ॒ते॒ । वि॒ऽत॒रम् । वरी॑यः । दे॒वेभ्यः॑ । अदि॑तये । स्यो॒नम् ॥ १०.११०.४

पदार्थ : (पृथिव्याः) वेदि के या प्रथित फैली हुई सृष्टि के (प्राचीनं बर्हिः) सामने प्रज्वलित अग्नि या पुरातन प्रवृद्ध ब्रह्म अग्नि (अस्याः-वस्तोः) इस वेदि के वास-प्रवर्तन के लिये या इस-सृष्टि के वास प्रवर्तन के लिये (प्रदिशा) विधि से या योग की प्रक्रिया से (अह्नाम्-अग्रे) दिनों के पूर्व (वृज्यते) अग्नि प्रकट किया जाता है या परमात्मा साक्षात्-किया जाता है, (वरीयः) अतिश्रेष्ठ (वितरम्) विस्तीर्ण (स्योनम्) सेवन करने योग्य हव्य या सुख (देवेभ्यः) वायु आदि देवों के लिये या जीवन्मुक्त आत्माओं के लिये (अदितये) पृथिवी के लिये या पृथिवीस्थ प्रजा के लिये (उ) अवश्य (वि प्रथते) विशिष्ट प्रवृद्ध होता है ॥४॥

भावार्थ : वेदि में अग्नि प्रज्वलित होकर हव्य पदार्थ को वायु आदि देवताओं में फैला देता है और पृथिवी पर भी हव्य का प्रभाव डालता है एवं परमात्मा विस्तृत सृष्टि के अन्दर व्यापक हुआ जीवन्मुक्तों व साधारण पृथिवीस्थ प्रजाओं के लिये सुख पहुँचाता है ॥४॥