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Rigveda / 10 / 111 / 6

वज्रे॑ण॒ हि वृ॑त्र॒हा वृ॒त्रमस्त॒रदे॑वस्य॒ शूशु॑वानस्य मा॒याः । वि धृ॑ष्णो॒ अत्र॑ धृष॒ता ज॑घ॒न्थाथा॑भवो मघवन्बा॒ह्वो॑जाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 111 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अष्ट्रादंष्ट्रो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : वज्रे॑ण । हि । वृ॒त्र॒ऽहा । वृ॒त्रम् । अस्तः॑ । अदे॑वस्य । शूशु॑वानस्य । मा॒याः । वि । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । अत्र॑ । धृ॒ष॒ता । ज॒घ॒न्थ॒ । अथ॑ । अ॒भ॒वः॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । बा॒ह्वुऽओ॑जाः ॥ १०.१११.६

पदार्थ : (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (वृत्रहा) आवरक अज्ञानादि का हनन करनेवाला है (वृत्रम्) उस आवरक अज्ञानादि बाधक को (वज्रेण) नाशक साधन से (अस्तः) नष्ट कर (धृष्णो) हे धर्षणशील ! (अथ) तथा (बाह्वोजा) बाहुओं में ओजवाला होता हुआ जैसा (अभवः) हो (अत्र) यहाँ (शूशुवानस्य) बढ़े हुए (अदेवस्य) प्रकाशरहित की (मायाः) अन्धकारमय कुटिल क्रियाओं को (धृषता) धर्षणसामर्थ्य से (वि जघन्थ) विशेषरूप से नष्ट कर ॥६॥

भावार्थ : परमात्मा अज्ञानादि आवरक बाधक को नष्ट करता है, बढ़े हुए पापी के कुटिल व्यवहारों को भी नष्ट करता है ॥६॥