Rigveda / 10 / 111 / 10
स॒ध्रीची॒: सिन्धु॑मुश॒तीरि॑वायन्त्स॒नाज्जा॒र आ॑रि॒तः पू॒र्भिदा॑साम् । अस्त॒मा ते॒ पार्थि॑वा॒ वसू॑न्य॒स्मे ज॑ग्मुः सू॒नृता॑ इन्द्र पू॒र्वीः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 111 | Mantra No : 10
In English:
Seer : aShTraada.mShTro vairuupaH | Devta : indra: | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sadhriichiiH sindhumushatiirivaayantsanaajjaara aaritaH puurbhidaasaam . astamaa te paarthivaa vasuunyasme jagmuH suunRRitaa indra puurviiH .
Component Words : sadhriichiiH . sindhum . ushatiiH.aiva . aayan . sanaat . jaaraH . aaritaH . puuH.abhit . aasaam . astam . aa . te . paarthivaa . vasuuni . asme iti . jagmuH . suunRRitaaH . indra . puurviiH . 10.111.10
In Hindi:
ऋषि : अष्ट्रादंष्ट्रो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : स॒ध्रीचीः॑ । सिन्धु॑म् । उ॒श॒तीःऽइ॑व । आ॒य॒न् । स॒नात् । जा॒रः । आ॒रि॒तः । पूः॒ऽभित् । आ॒सा॒म् । अस्त॑म् । आ । ते॒ । पार्थि॑वा । वसू॑नि । अ॒स्मे इति॑ । ज॒ग्मुः॒ । सू॒नृताः॑ । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्वीः ॥ १०.१११.१०
पदार्थ : (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (सध्रीचीः) साथ जाती हुई जलधाराओं (सिन्धुम्-इव) समुद्र को जैसे (आयन्) प्राप्त होती हैं, उसी भाँति (उशन्तीः) तुझ परमात्मा को चाहती हुईं-आप्त प्रजाएँ तुझे प्राप्त करती हैं (सनात्-आरितः) वह सनातन प्राप्त स्वामी (जारः) शरीरों का जीर्ण करनेवाला (पूर्भित्) शरीरों से पृथक् करनेवाला मोक्ष में प्रेरित करनेवाला (अस्मे) हमारी (पूर्वी) सनातन (सूनृताः) सुष्ठु वाणियाँ-स्तुतियाँ (पार्थिवा वसूनि) तेरे दिये शरीर में होनेवाले वासक बसानेवाले साधनों को-मनबुद्धिचित्ताहङ्कार (ते-अस्तम्) तेरे घर मोक्षधाम को (आजग्मुः) भलीभाँति प्राप्त करें ॥१०॥
भावार्थ : जैसे जलधाराएँ समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे आप्त मनुष्यप्रजाएँ परमात्मा को प्राप्त होती हैं, परमात्मा उनके शरीरों को जीर्ण कर देता है, पुनः-पुनः शरीर धारण करने से हटा देता है, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार आत्मा के साथ मोक्ष में चले जाते हैं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : अष्ट्रादंष्ट्रो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : स॒ध्रीचीः॑ । सिन्धु॑म् । उ॒श॒तीःऽइ॑व । आ॒य॒न् । स॒नात् । जा॒रः । आ॒रि॒तः । पूः॒ऽभित् । आ॒सा॒म् । अस्त॑म् । आ । ते॒ । पार्थि॑वा । वसू॑नि । अ॒स्मे इति॑ । ज॒ग्मुः॒ । सू॒नृताः॑ । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्वीः ॥ १०.१११.१०
भावार्थ :