Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 112 / 8

प्र त॑ इन्द्र पू॒र्व्याणि॒ प्र नू॒नं वी॒र्या॑ वोचं प्रथ॒मा कृ॒तानि॑ । स॒ती॒नम॑न्युरश्रथायो॒ अद्रिं॑ सुवेद॒नाम॑कृणो॒र्ब्रह्म॑णे॒ गाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 112 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : नभःप्रभेदनो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्व्याणि॑ । प्र । नू॒नम् । वी॒र्या॑ । वो॒च॒म् । प्र॒थ॒मा । कृ॒तानि॑ । स॒ती॒नऽम॑न्युः । अ॒श्र॒थ॒यः॒ । अद्रि॑म् । सु॒ऽवे॒द॒नाम् । अ॒कृ॒णोः॒ । ब्रह्म॑णे । गाम् ॥ १०.११२.८

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते) तेरे (पूर्व्याणि वीर्या) सनातन बलकर्मों का (नूनं प्र प्र वोचम्) पुनः-पुनः प्रवचन करता हूँ (प्रथमा कृतानि) जो तूने प्रमुखरूप से किये हैं (सतीनमन्युः) जल के समान मृदु दीप्ति जिसकी है, ऐसा शान्त ज्योतिवाला तू (अद्रिम्) श्लोककर्त्ता-वेदवक्ता को (अश्रथयः) हमारे लिये उपदेशार्थ छोड़े या स्वतन्त्र कर (ब्रह्मणे) ब्राह्मण के लिये (सुवेदनां गाम्) अच्छी ज्ञान देनेवाली वाणी को (अकृणोः) प्रकाशित कर ॥८॥

भावार्थ : परमात्मा के बल कार्य पूर्व से चले आये हैं, उनका प्रवचन करना चाहिये, वह शान्त तेजवाले वेदवक्ता को हमारे लिये भेजता है तथा चतुर्वेदवक्ता के लिये सुज्ञान देनेवाले ब्राह्मण के लिये भी प्रकाशित करता है ॥८॥