Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 115 / 3

तं वो॒ विं न द्रु॒षदं॑ दे॒वमन्ध॑स॒ इन्दुं॒ प्रोथ॑न्तं प्र॒वप॑न्तमर्ण॒वम् । आ॒सा वह्निं॒ न शो॒चिषा॑ विर॒प्शिनं॒ महि॑व्रतं॒ न स॒रज॑न्त॒मध्व॑नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 115 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : उपस्तुतो वार्ष्टिहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : तम् । वः॒ । विम् । न । द्रु॒ऽसद॑म् । दे॒वम् । अन्ध॑सः । इन्दु॑म् । प्रोथ॑न्तम् । प्र॒ऽवप॑न्तम् । अ॒र्ण॒वम् । आ॒सा । वह्नि॑म् । न । शो॒चिषा॑ । वि॒ऽर॒प्शिन॑म् । महि॑ऽव्रतम् । न । स॒रज॑न्तम् । अध्व॑नः ॥ १०.११५.३

पदार्थ : (वः) हे मनुष्यों ! तुम (तं देवम्) उस परमात्मदेव (अन्धसः-इन्दुम्) आध्यानीय स्नेहकर्त्ता (प्रोथन्तम्) प्राप्त होते हुए (प्रवपन्तम्) ज्ञानबीज बोते हुए (अर्णवम्) समुद्र के समान महान् (विं न द्रुषदम्) वृक्ष पर बैठनेवाले पक्षी के समान, संसारवृक्ष पर विराजमान परमात्मा को स्तुति में लाओ (आसा) भलीभाँति फेंकने के साधन (शोचिषा) तेज से (विरप्शिनम्) महान् (महिव्रतम्) महाकर्मवाले (अध्वनः-सरजन्तम्) मोक्षमार्ग के स्रष्टा (वह्निम्) संसार के वहन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करो ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि स्नेहकर्त्ता व्यापक ज्ञान के बीज को देनेवाले संसार के अधिष्ठाता मोक्षमार्ग के सृजन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करें ॥३॥