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Rigveda / 10 / 115 / 5

स इद॒ग्निः कण्व॑तम॒: कण्व॑सखा॒र्यः पर॒स्यान्त॑रस्य॒ तरु॑षः । अ॒ग्निः पा॑तु गृण॒तो अ॒ग्निः सू॒रीन॒ग्निर्द॑दातु॒ तेषा॒मवो॑ नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 115 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : उपस्तुतो वार्ष्टिहव्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सः । इत् । अ॒ग्निः । कण्व॑ऽतमः । कण्व॑ऽसखा । अ॒र्यः । पर॑स्य । अन्त॑रस्य । तरु॑षः । अ॒ग्निः । पा॒तु॒ । गृ॒ण॒तः । अ॒ग्निः । सू॒रीन् । अ॒ग्निः । द॒दा॒तु॒ । तेषा॑म् । अवः॑ । नः॒ ॥ १०.११५.५

पदार्थ : (सः-इत्) वह ही (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा (कण्वतमः) अत्यन्त मेधावी (कण्वसखा) तथा मेधाविजनों का मित्र (अर्यः) स्वामी है (अग्निः परस्य) परमात्मा दूसरे के निमित्त किये पाप का (अन्तरस्य) अपने अन्दर के स्वविषयक पाप का (तरुषः) हिंसक नाशक है (अग्निः) परमात्मा (गृणतः पातु) स्तुति करनेवाले जनों की रक्षा करता है (अग्निः) परमात्मा (तेषाम्) उन (नः) हम (सूरीन्) स्तुति करनेवालों को (अवः) रक्षण (ददातु) देता है ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा अत्यन्त मेधावी स्तुति करनेवालों का मित्र और स्वामी है। वह दूसरे के प्रति किये हुए अपने अन्दर के पाप को नष्ट करता है और स्तुति करनेवाले की रक्षा करता है ॥५॥