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Rigveda / 1 / 191 / 7

ये अंस्या॒ ये अङ्ग्या॑: सू॒चीका॒ ये प्र॑कङ्क॒ताः। अदृ॑ष्टा॒: किं च॒नेह व॒: सर्वे॑ सा॒कं नि ज॑स्यत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 191 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अबोषधिसूर्याः | छन्द : स्वराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ये। अंस्याः॑। ये। अङ्ग्याः॑। सू॒चीकाः॑। ये। प्र॒ऽक॒ङ्क॒ताः। अदृ॑ष्टाः। किम्। च॒न। इ॒ह। वः॒। सर्वे॑। सा॒कम्। नि। ज॒स्य॒त॒ ॥ १.१९१.७

पदार्थ : हे (अदृष्टाः) दृष्टिगोचर न हुए विषधारी जीवो ! (इह) इस संसार में (ये) जो (वः) तुम्हारे बीच (अंस्याः) स्कन्धों में प्रसिद्ध होनेवाले (ये) जो (अङ्ग्याः) अङ्गों में प्रसिद्ध होनेवाले और (सूचीकाः) सूची के समान व्यथा देनेवाले बीछी आदि विषधारी जीव तथा (ये) जो (प्रकङ्कताः) अति पीड़ा देनेवाले चञ्चल हैं और जो (किञ्चन) कुछ विष आदि हैं ये (सर्वे) सब तुम (साकम्) एक साथ अर्थात् विष समेत (नि, जस्यत) हम लोगों को छोड़ देओ वा छुड़ा देओ ॥ ७ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को उत्तम यत्न के साथ शरीर और आत्मा को दुःख देनेवाले विष दूर करने चाहियें, जिससे यहाँ निरन्तर पुरुषार्थ बढ़े ॥ ७ ॥