Rigveda / 10 / 118 / 4
घृ॒तेना॒ग्निः सम॑ज्यते॒ मधु॑प्रतीक॒ आहु॑तः । रोच॑मानो वि॒भाव॑सुः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 118 | Mantra No : 4
In English:
Seer : urukShaya aamahiiyavaH | Devta : agnii rakShohaa | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ghRRitenaagniH samajyate madhupratiika aahutaH . rochamaano vibhaavasuH .
Component Words : ghRRitena . agniH . sam . ajyate . madhu.apratiikaH . aa.ahutaH . rochamaanaH . vibhaa.avasuH . 10.118.4
In Hindi:
ऋषि : उरुक्षय आमहीयवः | देवता : अग्नी रक्षोहा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : घृ॒तेन॑ । अ॒ग्निः । सम् । अ॒ज्य॒ते॒ । मधु॑ऽप्रतीकः । आऽहु॑तः । रोच॑मानः । वि॒भाऽव॑सुः ॥ १०.११८.४
पदार्थ : (विभावसुः) विशिष्ट दीप्ति से बसानेवाला (रोचमानः) प्रकाशमान (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा या अग्नि, (घृतेन) देवकर्म-मुमुक्षुचर्य से या घृत से (सम् अज्यते) साक्षात् होता है या जलता है-प्रज्ज्वलित होता है (आहुतः) आमन्त्रित हुआ या होम में प्रदीप्त हुआ (मधुप्रतीकः) मधु सुखप्रतीति का निमित्त या-मधुगन्धप्रतीति करानेवाला होता है ॥४॥
भावार्थ : परमात्मा विशेष दीप्ति से बसानेवाला प्रकाशमान है। वह मुमुक्षुचर्या से साक्षात् होता है, वह मधुसुख की प्रतीति का निमित्त है एवं अग्नि विशिष्ट ज्योति से बसानेवाला प्रकाशमान घृत की आहुति से प्रज्ज्वलित होता है और मधुमय गन्ध की प्रतीति-कराता है, उससे प्रतिदिन होम करना चाहिये ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : उरुक्षय आमहीयवः | देवता : अग्नी रक्षोहा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : घृ॒तेन॑ । अ॒ग्निः । सम् । अ॒ज्य॒ते॒ । मधु॑ऽप्रतीकः । आऽहु॑तः । रोच॑मानः । वि॒भाऽव॑सुः ॥ १०.११८.४
भावार्थ :