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Rigveda / 10 / 124 / 3

पश्य॑न्न॒न्यस्या॒ अति॑थिं व॒याया॑ ऋ॒तस्य॒ धाम॒ वि मि॑मे पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि पि॒त्रे असु॑राय॒ शेव॑मयज्ञि॒याद्य॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑मि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 124 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अग्निः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : पश्य॑न् । अ॒न्यस्याः॑ । अति॑थिम् । व॒यायाः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धाम॑ । वि । मि॒मे॒ । पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि । पि॒त्रे । असु॑राय । शेव॑म् । अ॒य॒ज्ञि॒यात् । य॒ज्ञिय॑म् । भा॒गम् । ए॒मि॒ ॥ १०.१२४.३

पदार्थ : (अन्यस्याः वयायाः) अन्य प्राणपद मुक्तिरूप शाखा के (अतिथिं पश्यन्) निरन्तर प्रापणशील परमात्मा को इधर की सृष्टिरूप शाखा में स्थित मैं आत्मा देखता हूँ (ऋतस्य पुरूणि धाम) अमृत सुख भरे अङ्गों को (विममे) विशिष्टता से निर्माण करता हूँ (असुराय पित्रे) प्राणप्रद पिता को (शंसामि) स्तुति करता हूँ (अयज्ञियात्) असङ्गमनीय जड़ संसार से (यज्ञियं भागं शेवम्-एमि) यज्ञिय सङ्गमनीय भजनीय अपने जैसे चेतन सुखरूप परमात्मा को प्राप्त होता हूँ ॥३॥

भावार्थ : सृष्टिरूप भोगमयी शाखा को छोड़कर मुक्तिरूप स्थिर जीवन देनेवाली शाखा में अमृत भोग है, वहाँ सङ्कल्पात्मक अभौतिक अङ्गों से सुख भोगा जाता है, अपने जैसे चेतन परमात्मा के आश्रय उसे प्राप्त करना चाहिये ॥३॥