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Rigveda / 1 / 191 / 13

न॒वा॒नां न॑वती॒नां वि॒षस्य॒ रोपु॑षीणाम्। सर्वा॑सामग्रभं॒ नामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 191 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अबोषधिसूर्याः | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर विषहरण विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : न॒वा॒नाम्। न॒व॒ती॒नाम्। वि॒षस्य॑। रोपु॑षीणाम्। सर्वा॑साम्। अ॒ग्र॒भ॒म्। नाम॑। आ॒रे। अ॒स्य॒। योज॑नम्। ह॒रि॒ऽस्थाः। मधु॑। त्वा॒। म॒धु॒ला। च॒का॒र॒ ॥ १.१९१.१३

पदार्थ : हे विद्वान् ! जैसे मैं (विषस्य) विष की (सर्वासाम्) सब (रोपुषीणाम्) विमोहन करनेवाली (नवानाम्) नव (नवतीनाम्) नब्बे अर्थात् निन्यानवे विषसम्बन्धी पीड़ा की तरङ्गों का (नाम) नाम (अग्रभम्) लेऊँ और (अस्य) इस विष का (योजनम्) योग (आरे) दूर करता हूँ वैसे हे विषधारिन् (हरिष्ठाः) विष हरने में स्थिर वैद्य ! (त्वा) तुझे (मधु) मधुरता को (चकार) प्राप्त करता है वही इसकी (मधुला) मधुरता को ग्रहण करनेवाली विषहरण विद्या है ॥ १३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! हम लोग जो यहाँ निन्यानवे प्रकार का विष है उसके नाम, गुण, कर्म और स्वभावों को जानकर उस विष का प्रतिषेध करनेवाली ओषधियों को जान और उनका सेवन कर विषसम्बन्धी रोगों को दूर करें ॥ १३ ॥