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Rigveda / 2 / 1 / 2

तवा॑ग्ने हो॒त्रं तव॑ पो॒त्रमृ॒त्वियं॒ तव॑ ने॒ष्ट्रं त्वम॒ग्निदृ॑ताय॒तः। तव॑ प्रशा॒स्त्रं त्वम॑ध्वरीयसि ब्र॒ह्मा चासि॑ गृ॒हप॑तिश्च नो॒ दमे॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 1 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तव॑। अ॒ग्ने॒। हो॒त्रम्। तव॑। पो॒त्रम्। ऋ॒त्विय॑म्। तव॑। ने॒ष्ट्रम्। त्वम्। अ॒ग्नित्। ऋ॒त॒ऽय॒तः। तव॑। प्र॒ऽशा॒स्त्रम्। त्वम्। अ॒ध्व॒रि॒ऽय॒सि॒। ब्र॒ह्मा। च॒। असि॑। गृ॒हऽप॑तिः। च॒। नः॒। दमे॑॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के समान बलवान् वर्त्तमान विद्वान् ! (तव) विद्या, धर्म और नम्रता से प्रकाशमान जो आप उनका (होत्रम्) जिसमें पदार्थ होमा जाता वह होता का काम (तव) आपका (पोत्रम्) पवित्र काम (तव) आपका (नेष्ट्रम) पहुँचाने का काम वह है (त्वियम्) कि जो त्विजों के योग्य है (त्वम्) आप (अग्नित्) अग्नि को प्रदीप्त करनेवाले और (तायतः) अपने को सत्य की इच्छा करनेवाले (तव) आपका (प्रशास्त्रम्) उत्तम शिक्षा करना काम है (त्वम्) आप (अध्वरीयसि) अपने को अहिंसा कर्म की इच्छा करते (त्वम्)आप (ब्रह्मा) चारों वेदों के जाननेवाले (च, असि) हैं और (नः) हम लोगों के (दमे) जिसमें जन इन्द्रियों का दमन करते हैं इस घर में (गृहपतिः) घर के कामों की रक्षा करनेहारे (च) भी हैं ॥२॥

भावार्थ : जिस पुरुष का अग्निहोत्र के तुल्य उपकार, त्विजों के कर्म के समान पवित्र क्रिया, आप्त विद्वानों के समान न्याय, अग्नि विद्या को जाननेवाले के समान उद्यम, न्यायाधीश के समान न्याय-व्यवस्था, यज्ञ करनेवाले के समान अहिंसा, वेदपारङ्गत के समान विद्या, और गृहपति के समान ऐश्वर्य्य का संग्रह हो, वही प्रशंसा को प्राप्त होने योग्य होता है ॥२॥