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Rigveda / 10 / 133 / 6

व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यव॑: सखि॒त्वमा र॑भामहे । ऋ॒तस्य॑ नः प॒था न॒याति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 133 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सुदाः पैजवनः | देवता : इन्द्र: | छन्द : महापङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : व॒यम् । इ॒न्द्र॒ । त्वा॒ऽयवः॑ । स॒खि॒ऽत्वम् । आ । र॒भा॒म॒हे॒ । ऋ॒तस्य॑ । नः॒ । प॒था । न॒याति॑ । विश्वा॑नि । दुः॒ऽइ॒ता । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒केषा॑म् । ज्या॒काः । अधि॑ । धन्व॑ऽसु ॥ १०.१३३.६

पदार्थ : (इन्द्र) हे राजन् ! (वयं त्वायवः) हम तुझे चाहनेवाले तेरी कामना करनेवाले (सखित्वम्) तेरे सखीपन को (आरभामहे) अपने अन्दर धारण करते हैं और उसके अनुरूप वर्त्तते हैं (विश्वानि दुरिता अति) सब पापों-दुःखों को अतिक्रान्त करके (ऋतस्य पथा नय) सत्य के मार्ग से ले चल (नभन्ताम्०) पूर्ववत् ॥६॥

भावार्थ : प्रजा सदा राजा की मित्रता की कामना करती रहे और उसके बताये सत्यमार्ग नियम से चले ॥६॥