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Rigveda / 10 / 135 / 5

कः कु॑मा॒रम॑जनय॒द्रथं॒ को निर॑वर्तयत् । कः स्वि॒त्तद॒द्य नो॑ ब्रूयादनु॒देयी॒ यथाभ॑वत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 135 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुमारो यामायनः | देवता : यमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : कः । कु॒मा॒रम् । अ॒ज॒न॒य॒त् । रथ॑म् । कः । निः । अ॒व॒र्त॒य॒त् । कः । स्वि॒त् । तत् । अ॒द्य । नः॒ । ब्रू॒या॒त् । अ॒नु॒ऽदेयी॑ । यथा॑ । अभ॑वत् ॥ १०.१३५.५

पदार्थ : (कुमारं कः-अजनयत्) न मरनेवाले अमर आत्मा को कौन उत्पन्न करता है ? कोई नहीं (रथं कः-निः अवर्तयत्) शरीररथ को कौन मनुष्य घड़ता है ? कोई नहीं (कः स्वित्-अद्य नः-ब्रूयात्) कौन ही इस समय हमें बता सके (यथा-अनुदेयी-अभवत्) जैसे अनुग्रहवाला कृपालु है ॥५॥

भावार्थ : अमर आत्मा को कोई उत्पन्न नहीं करता, आत्मा तो नित्य है, इसके शरीररथ को कौन मनुष्य घड़ता है ? कोई मनुष्य नहीं। कौन कह सके ? पर हाँ अनुग्रहकर्ता परमात्मा इसे शरीर में भेजता है, वह इस शरीर को रचता है ॥५॥