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Rigveda / 2 / 1 / 8

त्वाम॑ग्ने॒ दम॒ आ वि॒श्पतिं॒ विश॒स्त्वां राजा॑नं सुवि॒दत्र॑मृञ्जते। त्वं विश्वा॑नि स्वनीक पत्यसे॒ त्वं स॒हस्रा॑णि श॒ता दश॒ प्रति॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 1 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वाम्। अ॒ग्ने॒। दमे॑। आ। वि॒श्पति॑म्। विशः॑। त्वाम्। राजा॑नम्। सु॒ऽवि॒दत्र॑म्। ऋ॒ञ्ज॒ते॒। त्वम्। विश्वा॑नि। सु॒ऽअ॒नी॒क॒। प॒त्य॒से॒। त्वम्। स॒हस्रा॑णि। श॒ता। दश॑। प्रति॑॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रतापवान् (विश्पतिम्) प्रजा की पालना करनेवाले ! (त्वाम्) (आपको) (विशः) प्रजाजन (दमे) निज घर में (आञ्जते) सब और से प्रसिद्ध करते हैं अर्थात् प्रजापति मानते हैं। और (सुविदत्रम्) सुन्दर देनेवाले (त्वाम्) (आपको) (राजानम्) अपना स्वामी प्रसिद्ध करते हैं। हे (स्वनीक) सुन्दर सेना रखनेवाले ! (त्वम्) आप (विश्वानि) समस्त पदार्थों को (पत्यसे) पतिभाव को प्राप्त होते हैं। और (त्वम्) आप (सहस्राणि) (सहस्रों) (शता) सैकड़ों और (दश) दहाइयों के (प्रति) प्रति पतिभाव को प्राप्त होते हैं ॥८॥

भावार्थ : वही राजा होने योग्य है, जिसको समस्त प्रजाजन स्वीकार करें। वही सेनापति होने को योग्य है, जो दश वा सौ वा सहस्र वीरों के साथ युद्ध कर सकता है ॥८॥