Rigveda / 10 / 141 / 5
अ॒र्य॒मणं॒ बृह॒स्पति॒मिन्द्रं॒ दाना॑य चोदय । वातं॒ विष्णुं॒ सर॑स्वतीं सवि॒तारं॑ च वा॒जिन॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 141 | Mantra No : 5
In English:
Seer : agnistaapasaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aryamaNa.m bRRihaspatimindra.m daanaaya chodaya . vaata.m viShNu.m sarasvatii.m savitaara.m cha vaajinam .
Component Words : aryamaNam . bRRihaspatim . indram . daanaaya . chodaya . vaatam . viShNum . sarasvatiim . savitaaram . cha . vaajinam . 10.141.5
In Hindi:
ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : अ॒र्य॒मण॑म् । बृह॒स्पति॑म् । इन्द्र॑म् । दाना॑य । चो॒द॒य॒ । वात॑म् । विष्णु॑म् । सर॑स्वतीम् । स॒वि॒तार॑म् । च॒ । वा॒जिन॑म् ॥ १०.१४१.५
पदार्थ : (अर्यमणम्) हे अग्ने परमात्मन् ! तू सूर्य को (दानाय) स्वप्रकाशदान करने के लिए (चोदय) प्रेरित कर (बृहस्पतिम्) ऊर्ध्वदिग्वर्ती विद्युद्रूप अग्नि को वृष्टिदान के लिए प्रेरित कर (इन्द्रम्) अन्तरिक्षवाले वायु को विमान चलाने-गति देने के लिए प्रेरित कर (वातम्) पृथिवी के वायु को श्वास प्रदान के लिए प्रेरित कर (विष्णुम्) पृथिवी के अन्दर व्यापक उसे पिण्डीभूत कर ओषधि देने के लिए प्रेरित कर (सरस्वतीम्) नदी को स्वजलप्रवाह देने के लिए प्रेरित कर (च) और (वाजिनं सवितारम्) बलवान् जीवनसंचार करनेवाले उदय होनेवाले सूर्य को जीवन देने के लिए प्रेरित कर ॥५॥
भावार्थ : आदित्य, बृहस्पति-आकाश की विद्युत् अन्तरिक्ष की वायु, पृथिवी की वायु, पृथिवी के अन्दर के विष्णु-व्यापक अग्नि तत्त्व, नदी और प्रातःकाल उदय होनेवाले सूर्य को अपने-अपने लाभ देने के लिए प्रेरित करता है, वह स्तुति करने योग्य है ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : अ॒र्य॒मण॑म् । बृह॒स्पति॑म् । इन्द्र॑म् । दाना॑य । चो॒द॒य॒ । वात॑म् । विष्णु॑म् । सर॑स्वतीम् । स॒वि॒तार॑म् । च॒ । वा॒जिन॑म् ॥ १०.१४१.५
भावार्थ :