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Rigveda / 10 / 144 / 6

ए॒वा तदिन्द्र॒ इन्दु॑ना दे॒वेषु॑ चिद्धारयाते॒ महि॒ त्यज॑: । क्रत्वा॒ वयो॒ वि ता॒र्यायु॑: सुक्रतो॒ क्रत्वा॒यम॒स्मदा सु॒तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 144 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सुपर्णस्तार्क्ष्यपुत्र ऊर्ध्वकृशनो वा यामायनः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : ए॒व । तत् । इन्द्रः॑ । इन्दु॑ना । दे॒वेषु॑ । चि॒त् । धा॒र॒या॒ते॒ । महि॑ । त्यजः॑ । क्रत्वा॑ । वयः॑ । वि । ता॒रि॒ । आयुः॑ । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । क्रत्वा॑ । अ॒यम् । अ॒स्मत् । आ । सु॒तः ॥ १०.१४४.६

पदार्थ : (एव) इस प्रकार (इन्द्रः) आत्मा (इन्दुना) वीर्य पदार्थ से (देवेषु चित्) इन्द्रियों में भी (महि त्यजः) महान् तेज को (धारयते) धारण करता है (क्रत्वा) संयम कर्म से (वयः-आयुः) जीवन और दीर्घ आयु को (वि तारि) प्रवृद्ध करता है (सुक्रतो) हे संयमरूप सुष्ठु कर्म से प्राप्त होने योग्य वीर्य पदार्थ (अयम्) यह तू (अस्मत्) हमारे द्वारा (क्रत्वा) कर्म से (आ सुतः) भलीभाँति प्राप्त हुआ अभीष्ट को सिद्ध कर ॥६॥

भावार्थ : आत्मा संयम से वीर्य की रक्षा करके द्वारा इन्द्रियों में तेज धारण करता है, जीवन और आयु को बढ़ाता है, सुरक्षित वीर्य द्वारा अभीष्ट कर्मफल सिद्ध होता है ॥६॥