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Rigveda / 10 / 146 / 2

वृ॒षा॒र॒वाय॒ वद॑ते॒ यदु॒पाव॑ति चिच्चि॒कः । आ॒घा॒टिभि॑रिव धा॒वय॑न्नरण्या॒निर्म॑हीयते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 146 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : देवमुनिरैरम्मदः | देवता : अरण्यानी | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : वृ॒षा॒ऽर॒वाय॑ । वद॑ते । यत् । उ॒प॒ऽअव॑ति । चि॒च्चि॒कः । आ॒घा॒टिभिः॑ऽइव । धा॒वय॑न् । अ॒र॒ण्या॒निः । म॒ही॒य॒ते॒ ॥ १०.१४६.२

पदार्थ : यहाँ से अरण्यानी का स्वरूप कहा जाता है। (वृषरवाय वदते) मन में सुखवर्षक शब्द या निरन्तर मेघवर्षण की भाँति मधुर शब्द करनेवाले पङ्खवाले सुक्ष्मजन्तु भिल्ली, झिङ्गुर झिङ्गा नामवाले बोलते हुए वीणावाद्य के समान (चिच्विकः-यत्-उपावति) चिच्-चिक् ऐसा श्ब्दानुकरण थोड़ा ठहर-ठहर कर करनेवाला पक्षहीन सूक्ष्म जन्तु वृक्ष से चिपटा हुआ पूर्व झिङ्गुर के शब्द को अनुपोषित करता है (आघाटिभिः-इव) सस्वर उच्चारण करनेवाले गायकों की भाँति (धावयन्) स्वर को प्रसारित करते हैं, इस प्रकार विविध बाजे गानों के द्वारा (अरण्यानि महीयते) अरण्यानी प्रशस्त की जाती है ॥२॥

भावार्थ : मन में सुख वर्षानेवाले मेघवर्षण के समान मधुर ध्वनि करनेवाला झिङ्गुर और उसका अनुपोषण शब्द करनेवाला चिच् चिक् वृक्ष से लिपटा हुआ सूक्ष्म जन्तु सस्वर गाने जैसे उच्चारण करनेवाला सूक्ष्म जन्तु जहाँ इस प्रकार गाना बजाना कर रहे होते हैं, वह अरण्यानी है, जो जङ्गल में घूमनेवालों के लिए बहुत रुचिकर है ॥२॥