Rigveda / 10 / 149 / 5
हिर॑ण्यस्तूपः सवित॒र्यथा॑ त्वाङ्गिर॒सो जु॒ह्वे वाजे॑ अ॒स्मिन् । ए॒वा त्वार्च॒न्नव॑से॒ वन्द॑मान॒: सोम॑स्येवां॒शुं प्रति॑ जागरा॒हम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 149 | Mantra No : 5
In English:
Seer : archanhairaNyastupaH | Devta : savitaa | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : hiraNyastuupaH savitaryathaa tvaa~Ngiraso juhve vaaje asmin . evaa tvaarchannavase vandamaanaH somasyevaa.mshu.m prati jaagaraaham .
Component Words : hiraNya.astuupaH . savitaH . yathaa . tvaa . aa~NgirasaH . juhve . vaaje . asmin . eva . tvaa . archan . avase . vandamaanaH . somasya.aiva . a.mshum . prati . jaagara . aham . 10.149.5
In Hindi:
ऋषि : अर्चन्हैरण्यस्तुपः | देवता : सविता | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : हिर॑ण्यऽस्तूपः । स॒वि॒तः॒ । यथा॑ । त्वा॒ । आ॒ङ्गि॒र॒सः । जु॒ह्वे । वाजे॑ । अ॒स्मिन् । ए॒व । त्वा॒ । अर्च॑न् । अव॑से । वन्द॑मानः । सोम॑स्यऽइव । अं॒शुम् । प्रति॑ । जा॒ग॒र॒ । अ॒हम् ॥ १०.१४९.५
पदार्थ : (सवितः) हे उत्पादक परमात्मन् ! (अङ्गिरसः) प्राणों में साधु, प्राणायामाभ्यासी, प्राणविद्या को जाननेवाला ! (हिरण्यस्तूपः) अमृतमय सङ्घात जिसका है, ऐसा जीवन्मुक्त (त्वां जुह्वे) तुझ-तेरी उपासना करता है (अस्मिन् वाजे) इस मोक्षविषयक अमृतान्न भोग के निमित्त (एवा त्वा-अवसे) इस प्रकार तुझे रक्षा के लिए (वन्दमानः-अर्चन्) वन्दन स्वभाववाला तेरी स्तुति करता हुआ (सोमस्य-अंशुं प्रति-इव) सोमरस के प्रति जैसे जागते हैं, ऐसे (अहं जागर) तुझे प्राप्त करने को जागता हूँ या सोम के रस की भाँति अपनी आत्मा को तेरे लिए समर्पित करने को जागता हूँ ॥५॥
भावार्थ : प्राणायामाभ्यासी प्राणविद्या का जाननेवाला जीवन्मुक्त परमात्मा की उपासना करता है, मोक्ष-विषयक अमृतान्नभोग प्राप्त करने के लिए वन्दन स्वभाववाला होकर सोमरस के पान करने के लिए सदा जागरूक रहता है या अपने को सोमरस की भाँति परमात्मा के प्रति समर्पित करने को जागता है ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : अर्चन्हैरण्यस्तुपः | देवता : सविता | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : हिर॑ण्यऽस्तूपः । स॒वि॒तः॒ । यथा॑ । त्वा॒ । आ॒ङ्गि॒र॒सः । जु॒ह्वे । वाजे॑ । अ॒स्मिन् । ए॒व । त्वा॒ । अर्च॑न् । अव॑से । वन्द॑मानः । सोम॑स्यऽइव । अं॒शुम् । प्रति॑ । जा॒ग॒र॒ । अ॒हम् ॥ १०.१४९.५
भावार्थ :