Rigveda / 10 / 150 / 2
इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि । मर्ता॑सस्त्वा समिधान हवामहे मृळी॒काय॑ हवामहे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 150 | Mantra No : 2
In English:
Seer : mRRiLiiko vaasiShThaH | Devta : agniH | Metre : bRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ima.m yaj~namida.m vacho jujuShaaNa upaagahi . martaasastvaa samidhaana havaamahe mRRiLiikaaya havaamahe .
Component Words : imam . yaj~nam . idam . vachaH . jujuShaaNaH . upa.aaagahi . martaasaH . tvaa . sam.aidhaana . havaamahe . mRRiLiikaaya . havaamahe . 10.150.2
In Hindi:
ऋषि : मृळीको वासिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय :
पदपाठ : इ॒मम् । य॒ज्ञम् । इ॒दम् । वचः॑ । जु॒जु॒षा॒णः । उ॒प॒ऽआग॑हि । मर्ता॑सः । त्वा॒ । स॒म्ऽइ॒धा॒न॒ । ह॒वा॒म॒हे॒ । मृ॒ळी॒काय॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १०.१५०.२
पदार्थ : (इमं यज्ञम्) हे परमात्मन् ! इस अध्यात्मयज्ञ को या हे अग्ने ! इस होमयज्ञ को (इदं वचः) इस प्रार्थनावचन को या उच्चारण करने योग्य स्वाहावचन को (जुजुषाणः) सेवन करने के हेतु (उप आगहि) उपगत हो-प्राप्त हो या प्राप्त होता है (समिधानः) प्रकाशित होते हुए (त्वा मर्तासः) तुझे हम मनुष्य (हवामहे) आमन्त्रित करते हैं (मृळीकाय-हवामहे) सुख के लिए आमन्त्रित करते हैं ॥२॥
भावार्थ : परमात्मा अध्यात्मयज्ञ को और प्रार्थनावचन को स्वीकार करता है, जब मनुष्य उसका आह्वान करते हैं सुखप्राप्ति के लिए, तो वह उन्हें प्राप्त होता है एवं अग्नि होम यज्ञ को स्वाहावचन को प्रसिद्ध करती है उस सुख के लिए, वेदी में मनुष्य प्रदीप्त करते हैं होम के लिए ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : मृळीको वासिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
पदपाठ : इ॒मम् । य॒ज्ञम् । इ॒दम् । वचः॑ । जु॒जु॒षा॒णः । उ॒प॒ऽआग॑हि । मर्ता॑सः । त्वा॒ । स॒म्ऽइ॒धा॒न॒ । ह॒वा॒म॒हे॒ । मृ॒ळी॒काय॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १०.१५०.२
भावार्थ :