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Rigveda / 10 / 155 / 2

च॒त्तो इ॒तश्च॒त्तामुत॒: सर्वा॑ भ्रू॒णान्या॒रुषी॑ । अ॒रा॒य्यं॑ ब्रह्मणस्पते॒ तीक्ष्ण॑शृण्गोदृ॒षन्नि॑हि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 155 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : शिरिम्बिठो भारद्वाजः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : च॒त्तो इति॑ । इ॒तः । च॒त्ता । अ॒मुतः॑ । सर्वा॑ । भ्रू॒णानि॑ । आ॒रुषी॑ । अ॒रा॒य्य॑म् । ब्र॒ह्म॒णः॒ । प॒ते॒ । तीक्ष्ण॑ऽशृङ्ग । उ॒त्ऽऋ॒षन् । इ॒हि॒ ॥ १०.१५५.२

पदार्थ : (इतः) यहाँ से (चत्ता-उ) हिंसित ही (अमुतः) उस दूर स्थान से (चत्ता) हिंसित हो-नष्ट हो (सर्वा भ्रूणानि) सारे ओषधिगर्भो-बीजों को (आरुषी) नष्ट करनेवाली तू है (ब्रह्मणस्पते) हे ब्रह्माण्ड के स्वामिन् परमात्मा या मेघाच्छन्न आकाश के ज्ञाता विद्वन् ! (तीक्ष्णशृङ्ग) तीक्ष्ण तेजवाले (अराय्यम्) न देनेवाली दुर्भिक्ष-विपत्ति को (उदृषन्) दूर फैंकता हुआ (इहि) प्राप्त हो ॥२॥

भावार्थ : दुर्भिक्षरूप आपत्ति पास से, दूर से अर्थात् सभी स्थनों से हटे-नष्ट होवे, मेघवर्षण की विद्या जाननेवाला मेघ वर्षा कर उसे दूर करे ॥२॥