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Rigveda / 10 / 161 / 4

श॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानः श॒तं हे॑म॒न्ताञ्छ॒तमु॑ वस॒न्तान् । श॒तमि॑न्द्रा॒ग्नी स॑वि॒ता बृह॒स्पति॑: श॒तायु॑षा ह॒विषे॒मं पुन॑र्दुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 161 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः | देवता : राजयक्ष्मघ्नम् | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : श॒तम् । जी॒व॒ । श॒रदः॑ । वर्ध॑मानः । श॒तम् । हे॒म॒न्तान् । श॒तम् । ऊँ॒ इति॑ । व॒स॒न्तान् । श॒तम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । स॒वि॒ता । बृह॒स्पतिः॑ । श॒तऽआ॑युषा । ह॒विषा॑ । इ॒मम् । पुनः॑ । दुः॒ ॥ १०.१६१.४

पदार्थ : (शतं शरदः-वर्धमानः-जीव) हे रोगी तू सौ शरद् ऋतुओं तक बढ़ता हुआ जीवित रह (शतं हेमन्तान्) सौ हेमन्त ऋतुओं तक बढ़ता हुआ जीता रह (शतम्-उ वसन्तान्) सौ वसन्त ऋतुओं तक जीवित रह (इन्द्राग्नी शतम्) वायु अग्नि सौ वर्ष तक (सविता) सूर्य (बृहस्पतिः) बड़े लोकों का पालक परमात्मा (शतायुषा हविषा) सौ वर्ष आयुवाले हव्यद्रव्य से (इमं पुनः दुः) इस रोगी को देवें, जीवित रखें ॥४॥

भावार्थ : शरद् आदि ऋतुएँ, अग्नि, वायु, सूर्य आदि सौ वर्ष की आयु प्रदान करें, ऐसे चिकित्सा करनी चाहिए ॥४॥