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Rigveda / 10 / 162 / 5

यस्त्वा॒ भ्राता॒ पति॑र्भू॒त्वा जा॒रो भू॒त्वा नि॒पद्य॑ते । प्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 162 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : रक्षोहा ब्राह्मः | देवता : गर्भसंस्त्रावे प्रायश्चित्तम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : यः । त्वा॒ । भ्राता॑ । पतिः॑ । भू॒त्वा । जा॒रः । भू॒त्वा । नि॒ऽपद्य॑ते । प्र॒ऽजाम् । यः । ते॒ । जिघां॑सति । तम् । इ॒तः । ना॒श॒या॒म॒सि॒ ॥ १०.१६२.५

पदार्थ : (यः) जो अमीवा रोगकृमि (भ्राता-पतिः-भूत्वा) भ्राता-भ्राता जैसा जन्म से या पति जैसा पति के जन्मकाल से प्राप्त हुआ (जारः-भूत्वा) कौमार्य अवस्था को जीर्ण करनेवाला (त्वा निपद्यते) तुझे प्राप्त होता है, तेरे अन्दर बैठ जाता है (ते प्रजां जिघांसति) तेरी सन्तति को नष्ट करता है (तम्-इतः-नाशयामसि) उसे इस स्थान से नष्ट करते हैं ॥५॥

भावार्थ : स्त्री के अन्दर रोगकृमि भ्राता के समान जन्म के साथ आ गया है या पति के समान पति के वीर्य के साथ घुस जाता है या कौमारावस्था को नष्ट करता है, उसे नष्ट करना चाहिए ॥५॥