Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 167 / 4

प्रसू॑तो भ॒क्षम॑करं च॒रावपि॒ स्तोमं॑ चे॒मं प्र॑थ॒मः सू॒रिरुन्मृ॑जे । सु॒ते सा॒तेन॒ यद्याग॑मं वां॒ प्रति॑ विश्वामित्रजमदग्नी॒ दमे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 167 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रजमदग्नी | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : प्रऽसू॑तः । भ॒क्षम् । अ॒क॒र॒म् । च॒रौ । अपि॑ । स्तोम॑म् । च॒ । इ॒मम् । प्र॒थ॒मः । सू॒रिः । उत् । मृ॒जे॒ । सु॒ते । सा॒तेन॑ । यदि॑ । आ । अग॑मम् । वा॒म् । प्रति॑ । वि॒श्वा॒मि॒त्र॒ज॒म॒द॒ग्नी॒ इति॑ । दमे॑ ॥ १०.१६७.४

पदार्थ : (विश्वामित्रजमदग्नी) हे सर्वमित्र ब्रह्मा तथा प्रज्वालिताग्निवाले पुरोहित ! (वां प्रति) तुम दोनों के सम्मुख (सातेन) जनगण द्वारा दिये राज्याधिकार से (सुते) राजसूययज्ञ निष्पन्न हो जाने पर (आगमम्) मैं राजपद पर आ विराजा हूँ (प्रसूतः) तुम दोनों से प्रेरित हुआ (भक्षम्-अकरम्) राष्ट्र का भोग करता हूँ (यदि चरौ) यदि आचरणीय सेवनीय (अपि च-इमं स्तोमम्) और भी इस-स्तोतव्य राष्ट्र को (प्रथमः सूरिः) प्रमुख विद्वान् ब्रह्मात्मा, परमात्मा (उत्-मृजे) शोधन करे-अनुमोदन करे ॥४॥

भावार्थ : राजसूययज्ञ को ब्रह्मा और पुरोहित संपन्न करें, इनके सम्मुख प्रजा द्वारा दिया गया राज्याधिकार राजा स्वीकार करे और परमविद्वान् परम ब्रह्मा परमात्मा के आदेशानुसार उससे बल माँगता हुआ उसे चलाये, उसकी स्तुति करे ॥४॥