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Rigveda / 10 / 170 / 3

इ॒दं श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॑रुत्त॒मं वि॑श्व॒जिद्ध॑न॒जिदु॑च्यते बृ॒हत् । वि॒श्व॒भ्राड्भ्रा॒जो महि॒ सूर्यो॑ दृ॒श उ॒रु प॑प्रथे॒ सह॒ ओजो॒ अच्यु॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 170 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विभ्राट् सूर्यः | देवता : सूर्यः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : इ॒दम् । श्रेष्ठ॑म् । ज्योति॑षाम् । ज्योतिः॑ । उ॒त्ऽत॒मम् । वि॒श्व॒ऽजित् । ध॒न॒ऽजित् । उ॒च्य॒ते॒ । बृ॒हत् । वि॒श्व॒ऽभ्राट् । भ्रा॒जः । महि॑ । सूर्यः॑ । दृ॒शे । उ॒रु । प॒प्र॒थे॒ । सहः॑ । ओजः॑ । अच्यु॑तम् ॥ १०.१७०.३

पदार्थ : (ज्योतिषाम्) ज्योतियों की, (ज्योतिः) ज्योति (इदम्-उत्तमं श्रेष्ठम्) यह ऊपर गई हुई श्रेष्ठ-अविनश्वर (बृहत्-उच्यते) महत्त्वपूर्ण कही जाती है। (विश्वभ्राट्) विश्व को प्रकाश देनेवाला (भ्राजः) स्वयं प्रकाशमान (महि सूर्यः) महान् सूर्य है (दृशे) विश्व को दिखाने के लिए (उरु सहः-ओजः पप्रथे) बहुत बलरूप ओजस्वी प्रतापी प्रथित-प्रसिद्ध हो रहा है ॥३॥

भावार्थ : आकाश में सूर्य सब ज्योतियों का ज्योति, श्रेष्ठ और महान् है, यह जगत् को दिखाने के लिए बड़ा तेजस्वी प्रतापवान् प्रसिद्ध है ॥३॥