Rigveda / 10 / 171 / 2
त्वं म॒खस्य॒ दोध॑त॒: शिरोऽव॑ त्व॒चो भ॑रः । अग॑च्छः सो॒मिनो॑ गृ॒हम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 171 | Mantra No : 2
In English:
Seer : iTo bhaargavaH | Devta : indra: | Metre : viraaDgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tva.m makhasya dodhataH shiro.ava tvacho bharaH . agachChaH somino gRRiham .
Component Words : tvam . makhasya . dodhataH . shiraH . ava . tvachaH . bharaH . agachChaH . sominaH . gRRiham . 10.171.2
In Hindi:
ऋषि : इटो भार्गवः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : त्वम् । म॒खस्य॑ । दोध॑तः । शिरः॑ । अव॑ । त्व॒चः । भ॒रः॒ । अग॑च्छः । सो॒मिनः॑ । गृ॒हम् ॥ १०.१७१.२
पदार्थ : (त्वम्) हे ऐश्वर्यवन् परमेश्वर ! तू (मखस्य दोधतः) यज्ञ जैसे श्रेष्ठ कर्म को कम्पित-विचलित-विनष्ट करनेवाले का (त्वचः-शिरः-अव भरः) त्वचा से-शिर से सर को उतार दे (सोमिनः गृहम्-अगच्छः) उपासनारसवाले उपासक के हृदयघर को प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थ : परमात्मा यज्ञ जैसे श्रेष्ठ कर्म के ध्वंस करनेवाले की मूर्धा को नीचे गिरा देता है और अपने उपासक के हृदयघर को प्राप्त होता है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : इटो भार्गवः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : त्वम् । म॒खस्य॑ । दोध॑तः । शिरः॑ । अव॑ । त्व॒चः । भ॒रः॒ । अग॑च्छः । सो॒मिनः॑ । गृ॒हम् ॥ १०.१७१.२
भावार्थ :