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Rigveda / 2 / 2 / 11

स नो॑ बोधि सहस्य प्र॒शंस्यो॒ यस्मि॑न्त्सुजा॒ता इ॒षय॑न्त सू॒रयः॑। यम॑ग्ने य॒ज्ञमु॑प॒यन्ति॑ वा॒जिनो॒ नित्ये॑ तो॒के दी॑दि॒वांसं॒ स्वे दमे॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। नः॒। बो॒धि॒। स॒ह॒स्य॒। प्र॒ऽशंस्यः॑। यस्मि॑न्। सु॒ऽजा॒ताः। इ॒षय॑न्त। सू॒रयः॑। यम्। अ॒ग्ने॒। य॒ज्ञम्। उ॒प॒ऽयन्ति॑। वा॒जिनः॑। नित्ये॑। तो॒के। दी॒दि॒ऽवांस॑म्। स्वे। दमे॑॥

पदार्थ : हे (सहस्य) बल के विषय में उत्तम (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वान् ! (वाजिनः) उत्तम विज्ञानवान् पुरुष ! (नित्ये) नित्य (तोके) छोटे व्यवहार में और (स्वे) अपने (दमे) घर में (दीदिवांसम्) प्रकाशित करते हुए (यम्) जिस (यज्ञम्) विद्याप्राप्ति के व्यवहार को (उपयन्ति) प्राप्त होते हैं। (यस्मिन्) जिसमें (सुजाताः) उत्तम पुरुषार्थ से प्रसिद्ध (सूरयः) विद्वान् जन आनन्द को (इषयन्त) प्राप्त होवें। (सः) वह (प्रशंस्यः) प्रशंसा करने योग्य यज्ञ (नः) हम लोगों को आप (बोधि) बतलाइये ॥११॥

भावार्थ : जो विद्वानों के मार्ग से और सुशीलता से नित्य पदार्थों के विज्ञान को प्राप्त हों, वे औरों को भी प्राप्त करावें ॥११॥