Rigveda / 10 / 184 / 3
हि॒र॒ण्ययी॑ अ॒रणी॒ यं नि॒र्मन्थ॑तो अ॒श्विना॑ । तं त॒त गर्भं॑ हवामहे दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 184 | Mantra No : 3
In English:
Seer : tvaShTaa garbhakarttaa viShNurvaa praajaapatyaH | Devta : li~NgottaaH (garbhaarthaashiiH) | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : hiraNyayii araNii ya.m nirmanthato ashvinaa . ta.m tata garbha.m havaamahe dashame maasi suutave .
Component Words : hiraNyayii iti . araNii iti . yam . niH.amanthataH . ashvinaa . tam . te . garbham . havaamahe dashame maasi suutave . 10.184.3
In Hindi:
ऋषि : त्वष्टा गर्भकर्त्ता विष्णुर्वा प्राजापत्यः | देवता : लिङ्गोत्ताः (गर्भार्थाशीः) | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : हि॒र॒ण्ययी॒ इति॑ । अ॒रणी॒ इति॑ । यम् । निः॒ऽमन्थ॑तः । अ॒श्विना॑ । तम् । ते॒ । गर्भ॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥ १०.१८४.३
पदार्थ : (हिरण्ययी-अरणी) सुवर्णमय दो अरणी काष्ठ के समान (अश्विनौ) सूर्य-चन्द्रमा-स्त्रीपुरुषगत रजवीर्य (यं निर्मन्थतः) जिस गर्भ को निष्पादित करते हैं (ते) हे स्त्रि ! तेरे लिए (तं गर्भम्) उस गर्भ को (दशमे मासि) दशवें मास में (सूतवे हवामहे) प्रसव होने बाहर आने को आमन्त्रित करते हैं-यत्न करते हैं ॥३॥
भावार्थ : आकाश के सूर्य और चन्द्रमा ये दो अरणियाँ हैं, संसार की वस्तुओं के उत्पन्न होने में निमित्त हैं, इसी प्रकार पुरुष और स्त्री के वीर्य और रज ये दो अरणियों के समान गर्भ को उत्पन्न करती हैं और दशवें मास में पूर्णाङ्ग हो जाता है बाहर प्रसव होने के लिए, उसे यत्न से प्रसूत करना चाहिये ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्वष्टा गर्भकर्त्ता विष्णुर्वा प्राजापत्यः | देवता : लिङ्गोत्ताः (गर्भार्थाशीः) | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : हि॒र॒ण्ययी॒ इति॑ । अ॒रणी॒ इति॑ । यम् । निः॒ऽमन्थ॑तः । अ॒श्विना॑ । तम् । ते॒ । गर्भ॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥ १०.१८४.३
भावार्थ :