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Rigveda / 2 / 3 / 3

ई॒ळि॒तो अ॑ग्ने॒ मन॑सा नो॒ अर्ह॑न्दे॒वान्य॑क्षि॒ मानु॑षा॒त्पूर्वो॑ अ॒द्य। स आ व॑ह म॒रुतां॒ शर्धो॒ अच्यु॑त॒मिन्द्रं॑ नरो बर्हि॒षदं॑ यजध्वम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 3 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। मन॑सा। नः॒। अर्ह॑न्। दे॒वान्। य॒क्षि॒। मानु॑षात्। पूर्वः॑। अ॒द्य। सः। आ। व॒ह॒। म॒रुता॑म्। शर्धः॑। अच्यु॑तम्। इन्द्र॑म्। न॒रः॒। ब॒र्हि॒ऽसद॑म्। य॒ज॒ध्व॒म्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) बिजुली के समान प्रचण्ड प्रतापवाले विद्वान् जन ! (मानुषात्) और मनुष्य से (पूर्वः) प्रथम (नः) हम लोगों का (अर्हन्) सत्कार करते हुए (ईडितः) स्तुति को प्राप्त (मनसा) विज्ञान से (देवान्) दिव्य गुणों के समान विद्वानों का (यक्षि) सत्कार करते हैं। (सः) सो आप (मरुताम्) पवनों के (अच्युतम्) न नष्ट होनेवाले (इन्द्रम्) बिजुलीरूप (बर्हिषदम्) बड़े-बड़े पदार्थों में स्थिर होनेवाले (शर्द्धः) बल को (अद्य) आज (आवह) प्राप्त कीजिये। हे (नरः) अग्रगामी नायकजनो ! उसको आप लोग (यजध्वम्) प्राप्त हूजिये ॥३॥

भावार्थ : जो विद्वानों का सत्कार कर विद्या को ग्रहण कराती हुई पवनों में स्थिर होनेवाली बिजुली को ग्रहण कर सकते हैं, वे अक्षयबली होकर सर्वत्र सत्कार को प्राप्त होते हैं ॥३॥