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Rigveda / 2 / 4 / 4

अ॒स्य र॒ण्वा स्वस्ये॑व पु॒ष्टिः संदृ॑ष्टिरस्य हिया॒नस्य॒ दक्षोः॑। वि यो भरि॑भ्र॒दोष॑धीषु जि॒ह्वामत्यो॒ न रथ्यो॑ दोधवीति॒ वारा॑न्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 4 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : ब्राह्म्युष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒स्य। र॒ण्वा। स्वस्य॑ऽइव। पु॒ष्टिः। सम्ऽदृ॑ष्टिः। अ॒स्य॒। हि॒या॒नस्य॑। धक्षोः॑। वि। यः। भरि॑भ्रत्। ओष॑धीषु। जि॒ह्वाम्। अत्यः॑। न। रथ्यः॑। दो॒ध॒वी॒ति॒। वारा॑न्॥

पदार्थ : (यः) जो (रथ्यः) रथों में उत्तम प्रशंसित (अत्यः) सुशिक्षित तुरङ्ग उसके (न) समान (वरान्) बालकों को जैसे वैसे स्वीकार करने योग्य लोकों को और (जिह्वाम्) अपनी जिह्वा को (दोधवीति) निरन्तर कम्पाता है और (ओषधीषु) सोमलतादि औषधीयों में (विभरिभ्रत्) विशेष कर निरन्तर गुणों को धारण करता हुआ विद्यमान है उस (अस्य) इस की हुई (स्वस्येव) अपनी पुष्टि के समान दूसरे की (रण्वा) प्रशंसनीय (पुष्टिः) अर्थात् धातुवृद्धि और (हियानस्य) वद्धि को प्राप्त होते हुए (अस्य) इस (धक्षोः) दाह करनेवाले अग्नि की (संदृष्टिः) अच्छे प्रकार दृष्टि करनी चाहिये ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे अपने पोषण के लिये अग्निविद्या प्राप्त की जाती है, वैसे औरों के लिये भी करनी चाहिये। जो इन्धनों से बढ़ता है और पदार्थों को जलाता है, वह रथों में युक्त किया हुआ अग्नि शीघ्र गमन कराता है। जैसे वक्ता अपनी जिह्वा को कंपाता है, वैसे अग्नि भूगोलों को कंपाता है॥४॥