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Rigveda / 2 / 5 / 2

आ यस्मि॑न्त्स॒प्त र॒श्मय॑स्त॒ता य॒ज्ञस्य॑ ने॒तरि॑। म॒नु॒ष्वद्दैव्य॑मष्ट॒मं पोता॒ विश्वं॒ तदि॑न्वति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 5 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : आ। यस्मि॑न्। स॒प्त। र॒श्मयः॑। त॒ताः। य॒ज्ञस्य॑। ने॒तरि॑। म॒नु॒ष्वत्। दैव्य॑म्। अ॒ष्ट॒मम्। पोता॑। विश्व॑म्। तत्। इ॒न्व॒ति॒॥

पदार्थ : (यस्मिन्) जिस (यज्ञस्य) सङ्गम करने के योग्य जगत् के (नेतरि) नायक सविता सूर्यमण्डल में (सप्त) सात (रश्मयः) किरणें (आतताः) विस्तृत हैं उसमें जो (मनुष्वत्) मनुष्य के तुल्य (दैव्यम्) दिव्य रश्मियों में प्रसिद्ध (अष्टमम्) आठवाँ विस्तृत है वह (पोता) शुद्ध करनेवाला (विश्वम्) समस्त जगत् को प्रकाशित करता है और (तत्) उस सूर्यमण्डल को भी (इन्वति) व्याप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सात विध रश्मियोंवाला सूर्य परिमाण से विस्तार को प्राप्त और पवित्र करनेवाला है, उसमें जो चेतन ब्रह्म व्याप्त वर्त्तमान है, वह समस्त सूर्यादिक को व्यवस्था प्राप्त करता [=कराता] है। जैसे मनुष्य शिल्पक्रिया से अनेक वस्तुओं को बनाते हैं, वैसे जगदीश्वर अखिल संसार का विधान करता है ॥२॥