Rigveda / 2 / 11 / 2
सृ॒जो म॒हीरि॑न्द्र॒ या अपि॑न्वः॒ परि॑ष्ठिता॒ अहि॑ना शूर पू॒र्वीः। अम॑र्त्यं चिद्दा॒सं मन्य॑मान॒मवा॑भिनदु॒क्थैर्वा॑वृधा॒नः॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 2
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : indra: | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : sRRijo mahiirindra yaa apinvaH pariShThitaa ahinaa shuura puurviiH. amartya.m chiddaasa.m manyamaanamavaabhinadukthairvaavRRidhaanaH.
Component Words : sRRijaH. mahiiH. indra. yaaH. apinvaH. pari.asthitaaH. ahinaa. shuura. puurviiH. amartyam. chit. daasam. manyamaanam. ava. abhinat. ukthaiH. vavRRidhaanaH.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : सृ॒जः। म॒हीः। इ॒न्द्र॒। याः। अपि॑न्वः। परि॑ऽस्थिताः। अहि॑ना। शू॒र॒। पू॒र्वीः। अम॑र्त्यम्। चि॒त्। दा॒सम्। मन्य॑मानम्। अव॑। अ॒भि॒न॒त्। उ॒क्थैः। व॒वृ॒धा॒नः॥
पदार्थ : हे (शूर) निर्भय (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान ! जैसे सूर्य (अहिना) मेघ (परिष्ठिताः) सब ओर से स्थित किये हुए वा (पूर्वीः) पहिले सञ्चित हुए जलों को (अवाभिनत्) छिन्न-भिन्न करता है वैसे (उक्थैः) उत्तम वचनों से (ववृधानः) बढ़े हुए आप (याः) जो (महिः) बड़ी-बड़ी वाणी हैं उनको (सृजः) उत्पादन कीजिये उनसे (चित्) ही (अमर्त्यम्) आत्मा से मरण धर्म रहित (मन्यमानम्) माननेवाले (दासम्) सेवक को (अपिन्वः) तृप्त कीजिये ॥२॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान उत्तम वाणियों को वर्षाते हैं, और सेवकों को प्रसन्न करते हैं, वे उत्तम प्रतिष्ठित होते हैं ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : सृ॒जः। म॒हीः। इ॒न्द्र॒। याः। अपि॑न्वः। परि॑ऽस्थिताः। अहि॑ना। शू॒र॒। पू॒र्वीः। अम॑र्त्यम्। चि॒त्। दा॒सम्। मन्य॑मानम्। अव॑। अ॒भि॒न॒त्। उ॒क्थैः। व॒वृ॒धा॒नः॥
पदार्थ : (सृजः) उत्पादय (महीः) महत्यो वाचः (इन्द्र) सूर्यवद्वर्त्तमान (याः) (अपिन्वः) पिन्व (परिष्ठिताः) परितः स्थिताः (अहिना) मेघेन (शूर) निर्भय (पूर्वीः) पूर्वं भूताः (अमर्त्यम्) आत्मना मरणधर्मरहितम् (चित्) अपि (दासम्) सेवकम् (मन्यमानम्) (अव) (अभिनत्) भिनत्ति (उक्थैः) उत्तमवचनैः (वावृधानः) वर्धमानः ॥२॥
अन्वय : हे शूर इन्द्र यथा सूर्योऽहिना परिष्ठिताः पूर्वीरपोवाऽभिनत्तथोक्थैर्ववृधानस्त्वं या महीः सृजस्ताभिश्चिदमर्त्यं मन्यमानं दासमपिन्वः ॥२॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये सूर्यवत्सुवाचो वर्षन्ति सेवकान् प्रसादयन्ति ते सुप्रतिष्ठिता भवन्ति ॥२॥